डायरी की विधा से मुक्त डायरी: एक साहित्यिक की डायरी

मुक्तिबोध कृत ‘एक साहित्यिक की डायरी’ फिक्शन और नॉन-फिक्शन के सरलीकृत द्विभाजन को प्रश्नांकित करती है। कहा जा सकता है कि फिक्श्नलाइज्ड नॉन-फिक्श्न के प्रयोगात्मक हस्तक्षेप से मुक्तिबोध इस डायरी को डायरी के प्रचलित अर्थों से परे ले जाते हैं।

अनूप कुमार बाली

मुक्तिबोध कृत ‘एक साहित्यिक की डायरी’ फिक्शन और नॉन-फिक्शन के सरलीकृत द्विभाजन को प्रश्नांकित करती है। कहा जा सकता है कि फिक्श्नलाइज्ड नॉन-फिक्श्न के प्रयोगात्मक हस्तक्षेप से मुक्तिबोध इस डायरी को डायरी के प्रचलित अर्थों से परे ले जाते हैं। डायरी की प्रचलित अवधारणा के संदर्भ में व्यक्ति के विविध जीवन-अनुभवों का कोश दिमाग में आता है। लेकिन मुक्तिबोध की यह डायरी कई बातों में निजी डायरी से अलग है। इस ओर संकेत करते हुए वैभव सिंह लिखते हैं,

…यह प्रचलित किस्म की डायरी नहीं है जिसमें रोज़ाना की घटनाएँ, साधारण-असाधारण लोगों से संपर्क या निजी सुख-दुख के विवरण दर्ज़ होते हैं। यह निबंध व कथा के रचनात्मक तालमेल में उपजे विचारों के संकलन की डायरी है जिसमें आलोचना से लेकर रचना तक के मानदंडों की पड़ताल की गई है। कहानी की शैली में आलोचना को विकसित करने का प्रयास भी इसे विशिष्ट बनाता है। (194, स्वारेखांकन)

प्रस्तुत आलेख निबंध और कथा के इस रचनात्मक तालमेल से उपजी एक साहित्यिक की डायरी के वैशिष्ट्य को विश्लेषित करने का प्रयास है। ध्यातव्य हो कि प्रस्तुत डायरी के लगभग सभी विषय कवि-व्यक्तित्व, व्यक्तित्व विश्लेषण, समाज, साहित्य और साहित्यकारों-आलोचकों आदि से संबद्ध हैं। अत: यह निजी न होकर सामाजिक कृति है। जिस तरह लेखक की कृति अपनी सामाजिक भूमिका के कारण उसके द्वारा रचित होते हुए भी सामाजिक कृति होती है, उसी तरह यह डायरी पारिवारिक, सामाजिक तथा साहित्यिक बदलावों पर यों प्रकाश डालती है कि मुक्तिबोध के समय के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के लेखे-जोखे की तरह स्थापित होती है। डायरी के यह निबंध मुख्यत: मुक्तिबोध का स्तंभ-लेखन हैं जो कि ‘एक साहित्यिक की डायरी’ के नाम से वसुधा, नवलेखन तथा कृति जैसी पत्रिकाओं में धारावाहिक रूप में छपा करते थे। अत: यह रेखांकित करना सार्थक हो सकता है कि मुक्तिबोध ने इस स्तंभ-लेखन के उद्यमों की किसी पुस्तक-रूप में कल्पना नहीं की थी बल्कि सन् 1955-1963 के बीच लिखे पूर्ण-अपूर्ण तथा प्रकाशित-अप्रकाशित इन निबंधों में मुक्तिबोध एक साहित्यिक और आलोचक के बतौर उन प्रश्नों और चिंताओं पर अपना आत्मालोचन करते दिखाई देते हैं जोकि उनके साहित्य और चिंतन के मूल प्रश्न और विमर्श हैं। अत: मुक्तिबोध को संभावित समग्रता में समझने के लिए प्रस्तुत डायरी एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। 

मुक्तिबोध का कथात्मक गद्य

इस प्रश्न पर विचार करना सहायक हो सकता है कि डायरी में विकसित हुआ विधागत रूप मुक्तिबोध के गद्य लेखन में किस तरह दिखाई पड़ता है। अत: इस संभावना पर ध्यान देना ज़रूरी लगता है कि क्या निबंधात्मक और कथात्मक शैलियों का संयुक्त प्रयोग वे अपने गद्य-लेखन के विविध प्रयासों में भी करते हैं? इस सवाल पर विचार करने के लिए उनके कथालोक पर विचार करना ज़रूरी लगता है। यह गौरतलब है कि मुक्तिबोध के कथालोक में रचनात्मकता और वैचारिकता का अन्योन्याश्रित संबंध दिखाई पड़ता है। उनकी कथा की रचनात्मक कल्पना उनकी वैचारिक आलोचना को प्रोत्साहित करती दिखाई पड़ती है। कहानी के पात्रों के बीच हो रहे संवाद कथावाचक को अपने संस्कृतिकर्मी के कर्तृत्व पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मसलन, उनकी कहानी क्लॉड ईथरली के इस हिस्से पर गौर किया जा सकता है:

आज तक किसी आदमी ने मुझसे इस तरह का सवाल नहीं किया था। ज़रूर मुझमें ऐसा कुछ है कि जिसे मैं विशेष योग्यता कह सकता हूँ। मैंने अपने जीवन में जो शिक्षा और अशिक्षा प्राप्त की, स्कूलों-कॉलेजों में जो विद्या और अविद्या उपलब्ध की, जो कौशल और अकौशल प्राप्त किया, उसने मुझे—मैं मानूँ या न मानूँ—भद्रवर्ग का ही अंग बना दिया है। हाँ, मैं उस भद्रवर्ग का अंग हूँ कि जिसे अपनी भद्रता के निर्वाह के लिए अब आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ता है, और यह भाव मन में जमा रहता है कि नाश सन्निकट है। संक्षेप में, मैं सचेत व्यक्ति हूँ, अतिशिक्षित हूँ, अतिसंस्कृत हूँ। लेकिन चूंकि अपनी इस अतिशिक्षा और अतिसंस्कृति के सौष्ठव को उद्घाटित करते रहने के लिए जो स्निग्ध-प्रसन्न मुख चाहिए, वह न होने से मैं उठाईगिरा भी लगता हूँ—अपने-आपको !

(मुक्तिबोध रचनावली 3, 156)

कहानी के बीच उजागर होता यह हिस्सा न केवल कथावाचक का पुनरावलोकन है बल्कि मुक्तिबोध स्वयं इस आत्मालोचना के केंद्र में जान पड़ते हैं। स्वतंत्र रूप से देखने पर यह मुक्तिबोध की निजी डायरी का हिस्सा भी लग सकता है। अत: इस वैशिष्ट्य पर गौर करना ज़रूरी है कि अपनी कहानियों में मुक्तिबोध रचनात्मक कल्पना द्वारा कथा का विधान करने के क्रम में एकाएक ही ऐसी अंतर्दृष्टि का प्रक्षेपण करते हैं कि कहानी के बीच वाचक या किसी पात्र का अंतरावलोकन लेखक के साथ ही साथ पाठक को भी आत्मिक विश्लेषण की ओर प्रवृत्त करता है। ऐसे आत्मिक विश्लेषण से प्रेरित तथा सूचित यह अंतरावलोकन की प्रवृत्ति ही उनकी कथा के भावात्मक लोक में डायरी या निजी डायरी की बनावट (texture) को सुनिश्चित करती है। अत: यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि आत्मिक विश्लेषण से सूचित और प्रेरित अंतरावलोकन की यह प्रवृत्ति मुक्तिबोध के निबंधात्मक कथालोक का महत्त्वपूर्ण वैशिष्ट्य है।

यहाँ यह गौर करना भी सार्थक हो सकता है कि कथा की रचनात्मक कल्पना द्वारा उदित फैंटेसी के बीच मुक्तिबोध कभी-कभी ऐसे सवालों को भी उछाल देते हैं जोकि कथा की कल्पनात्मक फैंटेसी को जीवन-जगत की तीक्ष्ण आलोचना की ओर प्रवृत करती है। मसलन, क्लॉड ईथरली में ही कहानी के परिवेश को लेकर जब वाचक सवाल करता है कि क्या वह और सीआईडी अमेरीका में हैं, मुक्तिबोध शीत-युद्ध के सांस्कृतिक वर्चस्व की ओर संकेत करते हुए प्रतिक्रियावादी खेमे की कड़ी व्यंग्यात्मक आलोचना कर डालते हैं:

क्या हमने इंडोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुंबा के काव्य से? छि: छि:! वह जानवरों का, चौपायों का साहित्य है!

ब्रिटिश-अमरीकी या फ्रांसीसी कविता में जो मूड्स, जो मन: स्थितियाँ – बस वे हमारे यहाँ भी हैं, लाई जाती हैं। सुरुचि और आधुनिक भावबोध का तक़ाज़ा है कि उन्हें लाया जाए। क्यों? इसलिए कि वहाँ औद्योगिक सभ्यता है, हमारे यहाँ भी। (मुक्तिबोध रचनावली, 158)

इस तरह मुक्तिबोध अपने कथालोक में आत्मिक विश्लेषण के साथ ही साथ सामाजिक विश्लेषण करते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना को भी कथा का अभिन्न हिस्सा बनाते चलते हैं। कहा जा सकता है कि कथा में अंतरावलोकन की प्रवृत्ति तथा वैचारिक आलोचना की यह पैठ ही कथात्मक और निबंधात्मक प्रवृत्तियों का समन्वयन करती है। जहाँ एक ओर आत्मिक विश्लेषण द्वारा सूचित अंतरावलोकन की प्रवृत्ति मानसिक उथल-पुथल की ओर संकेत है तो वहीं सामाजिक विश्लेषण द्वारा सूचित वैचारिक आलोचना सामाजिक गतिमयता की ओर इशारा है। मुक्तिबोध के यहाँ इन दोनों में से किसी एक पक्ष पर अधिक ज़ोर नहीं है बल्कि उनके यहाँ इनमें द्वैत नहीं एकात्मकता है।

संजीव कुमार के अनुसार इस द्वैत का मिटना आलोचना को चुनौतीपूर्ण बना देता है क्योंकि “इसकी वजह से तयशुदा वर्गीकरण की सहूलियत छिन जाती है।” (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध? 211) मुक्तिबोधीय आलोचना वर्गीकरणों का सतत् नकार ही है क्योंकि वर्गीकरण ही रचनात्मकता की वास्तविक गति को नियंत्रित तथा परिसीमित करते हुए रचनात्मकता को परिभाषा और अस्मिता का विषय बनाते हैं। अत: जैसा कि हम आगे देखेंगे, मुक्तिबोध जब डायरी में अपनी रचना-प्रक्रिया या रचनात्मकता का चिह्नांकन करते हैं तो वे उसे परिभाषा या किसी अस्मिता में नहीं बांधते बल्कि रूप की पूर्व-निर्धारित अस्मिताओं और परिभाषाओं का विध्वंस करते हैं। यहाँ सवाल उठता है कि क्या एक साहित्यिक की डायरी पूर्व-निर्धारित रूप की अस्मिता का ही क्रिटीक नहीं है?

ध्यातव्य हो कि नामवर सिंह के अनुसार एक साहित्यिक की डायरी ऐसी गद्यकृति है जिसे “किसी पूर्वप्रचलित विधा के अंतर्गत रखना मुश्किल होगा।” (एकालाप और संलाप, 17) मुक्तिबोध के कथालोक की ओर लौटें तो हम पाते हैं कि उनकी अधिकतर कहानियों में मन की सूक्ष्म गतिकी और सामाजिक उथल-पुथल का द्वैत मिट जाता है जिस कारण नवीन कुमार नीरज के अनुसार पात्र के मन की बेचैनी बाहर के जगत में आरोपित होने लगती है। नीरज के अनुसार इसका कारण भटकाव है जिसके लिए मुक्तिबोध के पात्र नहीं स्वयं मुक्तिबोध ज़िम्मेदार हैं। मन की बेचैनी के इस सूक्ष्म निरूपण के कारण ही संजीव कुमार मुक्तिबोध के कथा-साहित्य के लिए अंतर्मुखी यथार्थवाद का पद गढ़ना चाहते हैं जिसकी उत्कृष्ट मिसाल उनके अनुसार उपसंहार कहानी है। (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 206)

जलना कहानी इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है। उसकी महत्ता इस कारण भी है कि वे मन की सूक्ष्म गतिकी तथा सामाजिक उथल-पुथल के बीच निम्न-मध्यम वर्गीय पारिवारिक दरिद्रता का चित्र खींचती हैं। कथा का नायक चुन्नू हालाँकि गणित में एम. एस-सी है लेकिन आर्थिक विपन्नता के कारण घर में दरिद्रता की छाया फैली हुई है। मुक्तिबोध इस कहानी में घर के भीतर सुबह की पहली चाय के प्रसंग के चित्रण से चुन्नू के अंतर्मन, परिवार की दरिद्रता, पति-पत्नी की अनबन में व्याप्त प्रेम और इस दरिद्रता के बावजूद परिवार के संघर्षशील अपनत्व और रागात्मिका को रेखांकित करते चलते हैं। निश्चित ही यह वह परिवार नहीं है जिसकी मुक्तिबोध अपनी डायरी में आलोचना करते हैं बल्कि कहानी का परिवेश यह बताता है कि सामाजिक संघर्ष की उथल-पुथल इस घर में भी मौजूद है जोकि घर के सरलीकृत श्रम-विभाजन को प्रभावित कर रही है। इसीलिए सुबह की पहली चाय चुन्नू बना रहा है और इस बात का अंदाज़ा उसकी पत्नी को रसोई से आ रही कप-बशियों की आवाज़ से होता है।

अभावों से जूझ रहे निम्नमध्यम वर्गीय परिवार की दरिद्रता से आगे कहानी में संघर्ष से उपजी जीवंत ऊष्मता का संचार होता भी मालूम होता है। एक ओर, चुन्नू का अपनी माँ को बाँहों में लेकर नाचना, बच्चे का ताली पीटना तथा दूसरी ओर उसकी पत्नी का दूसरे कमरे में चिड़चिड़ाते हुए गुस्से से फूटना। यह ऊष्मा चुन्नू में एक स्फूर्ति भर देती है। वह कमरे में कब से संभाले हुए अपने कागज़ों को फेंक रहा है और बच्चे को उन्हें ठीक से जमाने के लिए कहा गया है। उन कागज़ों को थैली में भर अपने कंधे पर लटकाए चुन्नू अपनी माँ की इच्छा अर्थात चाय के लिए दूध का बंदोबस्त करने निकला है।

यहाँ से कहानी दो समानांतर पटरियों पर दौड़ने लगती है। एक ओर, पत्नी घर में दो चम्मच दूध से बन चुकी चाय के गरम घूंट लेते हुए बंद खिड़की को पुन: खोल देती है। बाहर के विस्तृत दृश्य से अभिभूत होकर वह काम में लग जाती है। चूल्हे के लाल अंगारों और अपने हाथों की नीली चूड़ियों पर पड़ने वाले प्रकाश से गुज़रते हुए वह अपने अंतरावलोकन में उतरती जाती है। कल की उस घटना पर सोचने लगती है कि जिसने उसके मन में आत्मनाशक सपने और भाव तैरा दिए थे। इसी बीच वह सोचने लगती है कि

उसकी साथिनें पढ़-लिख गयीं, जिनमे से एक प्राइमरी स्कूल की टीचर है, दूसरी किसी दफ्तर में क्लर्क है, तीसरी नर्स हो गई है। यकायक उसके हृदय में अभाव का, हानि का दुख भरता गया। हर तीसरे साल बच्चे, जन्म और मृत्यु, कर्ज़ और अपमान, बढ़ती हुई जिम्मेदारियाँ और पेट में अन्न डालने की मुश्किलें, और काम, काम, काम! (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 166)

इस सोच में डूबे हुए उसे पता ही नहीं चला कि चूल्हे से तड़ाक् से उठ कर आई चिंगारी उसकी साड़ी के एक कोण में दुबककर बैठ गई। दूसरी ओर, चुन्नू उन कागज़ों कि जिन पर उसके बच्चों की लिखावट अंकित थी, को कंधे पर लादे पंसारी की दुकान की ओर बढ़ा जा रहा था। उसके मन में यह स्वप्न तड़पने लगा था कि वह अपने बच्चों को क्रांतिकारी बनाएगा।

मैं उन्हें क्रांतिकारी बनाऊँगा। मैं उन्हें समाज की तलछट बनने के लिए प्रेरित करूंगा, वे वहाँ बैठे-बैठे किताबें लिखेंगे, पैम्फ़प्लेट छापेंगे, और जो मिलेगा उसे सबके साथ खाकर उन सब भड़कीले दंभों से घृणा करेंगे कि जो शिक्षा और संस्कृति के नाम पर चलते हैं…। (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 167)

यहाँ तक हम देख सकते हैं कि मुक्तिबोध कितनी सूक्ष्मता से मन में चल रही क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का अंकन करते हैं। यही कारण है कि संजीव कुमार मुक्तिबोध को विशुद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार के बतौर देखते हैं। (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 208) साथ ही वे यह भी बताते हैं कि मुक्तिबोध इस दिशा में वर्गीय प्रश्न को बिलकुल भी नहीं छोड़ते। इस तरह मुक्तिबोध की कहानी निम्न-मध्यम वर्गीय जीवन की मनोवैज्ञानिक हलचलों को सामने लाने का प्रयास करती है।

कहा जा सकता है कि निम्न-मध्यम वर्गीय जीवन की ऐसी तंगहाली में चुन्नू की बीवी के जलने का प्रकरण मनोवैज्ञानिक हलचल का चरम मालूम होता है जिससे मुक्तिबोध पाठक को भी उद्वेलित करते हैं। इस चरम को व्यंजित करता यह मनोवैज्ञनिक क्षण नवीन कुमार नीरज के अनुसार “जलना कहानी के भीतर का यह क्षण उनके पूरे कथा-साहित्य में सबसे इंटैंस पल, सबसे तीव्रतम पल” लगता है। उनके अनुसार इस कहानी में जलना एक प्रतीक है उस पूरे परिवार की यातना और वेदना का जिसे उन्हें जीवन की अनिवार्य कड़ी के रूप में स्वीकारना पड़ा है। यहाँ यह रेखांकित करना ज़रूरी लगता है कि प्रस्तुत कहानी में यातना और वेदना के इस स्वीकार के अलावा निम्नमध्यम वर्गीय पारिवारिक जीवन में संघर्ष से सींचे गए अपनत्व और रागात्मिका का भी चित्रण है। बच्चे से यह सूचना मिलने पर की माँ ने चाय मांगी है चुन्नू तुरंत चाय लेकर स्त्री के पास जा बैठा। कहानी की यह अंतिम पंक्तियाँ उस परिवार के अपनत्व की ओर स्पष्ट संकेत करती जान पड़ती हैं।

बच्चों ने देखा कि उनके बूढ़े, झुकी-झुकी कमरवाले नाना के हाथ में बर्नोल है, और वे चुन्नीलाल के हाथ में उसे दे रहे हैं। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 269)

यहाँ स्पष्ट होता है कि मुक्तिबोध अपनी कहानी में पात्रों के बारीक अंतरावलोकन के माध्यम से कहानी की संवेदना को सींचते हैं। वे केवल वाचक या पात्रों के अंतरावलोकन में व्यापत तीक्ष्ण भावात्मक आवेग से ही संवेदनात्मक धक्का नहीं देते बल्कि इसके लिए नए माध्यमों को भी प्रयोग में लाते हैं।

उपसंहार कहानी में अख़बार में छपा ग्रामीण शिक्षक का सुसाइड नोट पाठक को अपने भावात्मक आवेग से एक ज़ोरदार संवेदनात्मक धक्का देता है जहाँ मुक्तिबोध व्यवस्था की निरंकुशता को को भी नंगा कर देते हैं।

चालीस रुपए माहवार तनख़्वाह और पाँच रुपए महंगाई। कुल रुपए पैंतालीस से गुज़र-बसर करना असंभव है। घर में बीमारी और बड़ा परिवार। ज़माने से तंग और दुनिया से हिरास, दिल से शिकस्त और तिश्नाकाम, मैं एक टीचर अपने परिवार का उदर-भरण करने में असमर्थ हूँ। पैंतालीस रुपए में पेट और घरवालों की सेहतें नहीं पाल सकता। नामुराद और नाकामयाब मैं टीचर ख़ुदखुशी कर रहा हूँ। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 94)

क्या कथा में मौजूद यह अंश ख़ुदकुशी करने वाले व्यक्ति के अंतरावलोकन को नहीं खोलता? ध्यातव्य हो कि मुक्तिबोध नागपुर में शुक्रवारी तालाब में होने वाली आत्महत्याओं से परेशान रहते थे जिस बारे में वे एक साहित्यिक की डायरी ही नहीं बल्कि अपनी निजी डायरी में भी लिखते हैं। (मुक्तिबोध रचनावली 4,  55, 173-176)

यह रेखांकित करना भी सार्थक हो सकता है कि मुक्तिबोध अपने कथा साहित्य में तीक्ष्ण भावात्मक आवेग के इस संवेदनात्मक धक्के के बीच गंभीर वैचारिकी को भी पैठाते हैं जोकि उनकी कथात्मक प्रक्रिया में अंतर्निहित निबंधात्मक प्रवृत्ति है। संजीव कुमार विपात्र में ऐसे वैचारिक निबंधात्मक कथनों की ओर विशेष ध्यान दिलाते हैं। (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 222-223) अंतरावलोकन और संवेदनात्मक प्रवृत्तियों का समन्वयन पक्षी और दीमक जैसी कहानी में मिलता है जहाँ मुक्तिबोध कथा-वाचक के आत्मिक विश्लेषण की प्रक्रिया में कथा-नायक के अंतर्जगत् के अंतर्विरोधों को संवेदनात्मक कंपनों से खोलते चलते हैं। इस दिशा में यह कहानी आभ्यंतर और बाह्य के अंतर्विरोधों के संबंधों को उजागर करती है। बाह्य और आभ्यंतर के इस जटिल आघात-प्रत्याघात का रूपांकन मुक्तिबोध कथावाचक के अंतरावलोकन से सूचित एकालाप से करते हैं जो प्रस्तुत कहानी को एक सूत्र में बांधता है। दूसरी ओर, अंतरावलोकन, संवेदनात्मक तथा वैचारिक प्रवृत्तियों अर्थात कथात्मक तथा निबंधात्मक प्रवृत्तियों का समन्वयन विपात्र जैसी लंबी कहानी या लघु उपन्यास में देखने को मिलता है। यहाँ हम विपात्र पर विचार करते हुए डायरी के प्रयोगात्मक हस्तक्षेप पर विचार करेंगे।

विपात्र, निर्वैयक्तिक व्यवस्था से उपजे आत्म-पराएपन को व्यंजित करता एक लघु उपन्यास है। मुक्तिबोध यहाँ एक शैक्षणिक संस्थान की आंतरिक घटनाओं को सामने लाते हैं। इस लिहाज़ से यह उपन्यास मुक्तिबोध के राजनाँद गाँव के जीवन के अत्यंत निकट प्रतीत होता है। गौरतलब है कि इसका रचनाकाल भी लगभग यही है। सूरज पालीवाल भी अपने लेख विपात्र के पचास वर्ष में इस निकटता की ओर संकेत करते हैं। अत: इस दिशा में विचार करना सार्थक हो सकता है कि संभवत: विपात्र का छोटा शहर मुक्तिबोध के राजनाँद गाँव के जीवन से ही प्रेरित हुआ हो और वहाँ की उबाऊ और ज्ञान विरोधी बैठकों में रहने की मुक्तिबोध की विवशता भी उनकी पीड़ा का एक कारण रही हो। यहाँ सवाल उठता है कि मुक्तिबोध विपात्र में इन बेफ़िजूल बैठकों को किस तरह प्रस्तुत करते हैं और वे इसका बुनियादी कारण किसे मानते थे।

एक बात साफ़ है कि हमें उस महफ़िल में मज़ा नहीं आता था, जिसमें विविध प्रकार के भोजनीय पदार्थों से लेकर कैंसर और ल्यूकीमिया तक, तथा भूतों से लेकर कम्युनिस्टों तक की चर्चाएँ होतीं। ये महफ़िलें, जो शाम के पाँच बजे से लेकर रात के बारह-एक बजे तक चलती रहतीं, उस अभाव का परिणाम थीं जिसे अकेलापन कहते हैं। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 210)

स्पष्ट है कि मुक्तिबोध उस अलगाव की ओर संकेत कर रहें हैं जिस कारण प्रत्येक व्यक्ति अकेला है और अकेलेपन की पीड़ा से बचने के लिए ही वह उन दरबारी महफ़िलों का हिस्सा बन रहा है जहाँ पीड़ा को कुछ देर के लिए भुलाया जा सके। प्रस्तुत कहानी में यह महफ़िलें बॉस के द्वारा प्रायोजित हैं। इस शिक्षण संस्थान में सब लोग बॉस की कृपा से ही कृतज्ञ हैं। अर्थात यहाँ ज्ञान-चर्चा या वाद-विवाद-संवाद नहीं बल्कि जुगाड़ तंत्र है, क्योंकि यहाँ

विज्ञानवालों को यह मालूम नहीं था कि हाल ही मैं कौन-कौन महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुए हैं, और हिंदी वालों को यह ज्ञात नहीं था कि आजकल इस क्षेत्र में क्या चल रहा है! …इस बीच हमारे यहाँ के एक ‘विद्वान’ ने अपने विषय के अपने विश्वविद्यालय के और दूसरे विश्वविद्यालय के तरह-तरह के ‘गैस-पेपर्स’ निकालकर एक प्रकाशक से आठ-एक सौ रुपया कमा भी लिए थे। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 216-217)

इस जुगाड़-तंत्र के माहौल में कथा-वाचक और जगत घुट रहे हैं। अपने इसी घुटन से उभरने के लिए वे शहर के उन कोनों-तिकोनों की खाक छानते हैं जिन्हें नीचले लोगों की बस्ती कहा जाता है और जहाँ जाना बॉस के आदेश से प्रतिबंधित है। ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध इस कहानी के माध्यम से शिक्षा-केंद्र के जुगाड़-तंत्र, इस छोटे शहर में मेहनतकश आबादी के वैविध्य और उस पूरे परिवेश और पृष्ठभूमि का अध्ययन और चित्रण करना चाहते हैं जहाँ तथाकथित ज्ञान के केंद्र मेहनतकश आबादी की बसाहट से अलग ही नहीं बल्कि उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं।

अत: यह गौरतलब है कि यहाँ मुक्तिबोध अपने कथात्मक गद्य में अध्ययन, विश्लेषण और कलात्मक चित्रण साथ-साथ करते चलते हैं। यहाँ भी इस व्यापक तस्वीर को प्रस्तुत करने के लिए यह लंबी कहानी अपने में औपन्यासिक संरचना को लिए रखती है। यहाँ घटनाओं के नाटकीय उतार-चढ़ाव तथा गतिमयता से अधिक व्यक्तियों और परिवेश के बारीक पहलू खुलते हैं। अत: इस लंबी कहानी को लघु उपन्यास कहना गलत न होगा। पात्रों का एकालाप और संलाप परिवेश में घुलता है तो परिवेश का बारीक चित्रण कथ्य को दृश्यात्मक दिशा देता है। इसी दृश्यात्मक दिशा के बीच मुक्तिबोध गहन वैचारिकता से लैस निबंधात्मक कथनों को भी पैठा देते हैं। इस तरह मुक्तिबोध अध्ययन, विश्लेषण और कलात्मक चित्रण को सहजता से साधते हैं।

एक ओर कहानी में मुक्तिबोध जगत, राव साब, मिस्टर भनावत, मिस्टर मिश्रा और बॉस के चारित्रिक रेखाचित्र का गहराई से अंकन करते हैं। बॉस के प्रेम में अंतर्निहित तानाशाही की प्रवृत्ति को बारीकी से खोलते हैं। तो वहीं दूसरी ओर वे इन पात्रों के संवाद के माध्यम से संस्थान और शहर के परिवेश को भी सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस दिशा में, वे पात्रों की आंतरिक बेचैनी और कशमकश को बेकार महफ़िलों में बेफ़िजूल खर्च होते हुए दिखाते हैं तो वहीं इसी बेचैनी के कारण कुछ पात्र शहर भर में दौड़ लगा रहे हैं। पराएपन की यह बेचैनी उन्हें गंदे और धुएँदार होटलों में ले जाती है। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 218) मुक्तिबोध अपने गद्यात्मक चित्रण से शहर के मेहनतकश हिस्सों को जीवंत कर देते हैं। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 212) ध्यातव्य हो कि सुधीश पचौरी यह रेखांकित करते हैं कि मुक्तिबोध शहरी और उसमें कस्बाई मध्यवर्ग के जीवन का ऐसा प्रभावशाली चित्रण करते हैं जो किसी समाजशास्त्री ने भी न किया हो। (मुक्तिबोध: एक पुनर्विचार, 15) हमारा मानना है कि मुक्तिबोध अपनी फैंटेसिक शैली द्वारा समाजशास्त्रीय वर्णन के आनुभविक का निषेधात्मक प्रयोग करते हैं। उनकी निषेधात्मक रचना-प्रक्रिया यथार्थ का निषेधात्मक स्वीकार है या यों कहें कि यथार्थ के वास्तविक से वास्तविक के यथार्थ का परिमार्जन होना है। बहरहाल समाजशास्त्रीय वर्णन से आगे बढ़ते हुए मुक्तिबोध कथ्य की औपन्यासिक संरचना में शहर के नीचले इलाकों के समाजशास्त्रीय गठन और उसकी लोकप्रियता के अध्ययन को भी शामिल कर लेते हैं। यह लंबा उद्धरण इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है कि मुक्तिबोध किस तरह रचनात्मक गद्य को एक इलाके की अध्ययनशीलता का विषय भी बना देते हैं।

इस शहर की समाजशास्त्रीय लोकप्रियता की ओर उसका इशारा था। यहाँ के, इस क्षेत्र के, इस प्रदेश के मूल देशवासियों ने शायद ही कभी राज्य किया हो। साधारणत: जनता मूलत: किसान थी। वह निचली जातियों से बनी थी। राजस्थान के और पश्चिम उत्तर प्रदेश के, आंध्र के और महाराष्ट्र के, लोगों ने आकर यहाँ ज़मीन-जायदाद बनाई। यहाँ का मध्य वर्ग इन्हीं लोगों से बना। और पुराने ज़माने से इन लोगों ने ज़मीन-जायदाद बढ़ाते हुए, यहाँ की निम्नवर्गीय स्त्रियों को अपने घर में रखा। और उससे जो वर्ण-संकर सन्तानें पैदा हुईं वे भी अंतत: उसी निचली जनता में मिल गई। निस्संदेह इस जनता में भीतर-ही-भीतर उच्चवर्गीय हिंदुओं के प्रति असंतोष और विरोध का भाव पैदा हो गया और राजनीति के अभाव में उसने पुराने ज़माने से ही सामुदायिक रूप ग्रहण कर लिया। नतीजा यह हुआ कि निचली जातियों में, सुदूर अतीत में ही, सतनामियों और कबीरपंथियों का ज़ोर और प्रभाव बढ़ा; और आधुनिक काल में ईसाई मिशनरियों का। और अब तो बहुतेरे नवबौद्ध भी हो गए। फिर भी इस निचली जनता में जो सनातनधर्मी बचे, उन्होनें अपना संस्कृतिकरण करते हुए जनेऊ पहनना शुरू कर दिया और अपने बच्चों को आधुनिक प्रकार की शिक्षा-दीक्षा दिलाने का प्रयत्न करने लगे। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 217-218)

अगर पहली पंक्ति को हटा दिया जाए तो यह पूरा अनुच्छेद ही किसी इलाके के समाजशास्त्रीय इतिहास का विलक्षण नमूना लगता है। मुक्तिबोध अपने गद्य लेखन में ऐसे कई उदाहरण पेश करते हैं। कथा में समाजशास्त्रीय इतिहास को शामिल करने की ही तरह वे इतिहास को भी कल्पना से सींचते हुए कथात्मक टच देते हैं। उनकी बहुचर्चित पुस्तक भारत: इतिहास और संस्कृति पर बात करते हुए माधव हाड़ा उनके इतिहास लेखन में कल्पना से प्रेरित कथात्मक प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाते हैं।

वे अनुमान और कल्पना का सहारा लेकर छूटी हुई कड़ियाँ जोड़ते हैं या खाली जगह भरते हैं, लेकिन इस दौरान पारिस्थितिक साक्ष्यों से ज़्यादा दूर नहीं जाते। गौतम के महात्मा बुद्ध बनने की प्रक्रिया का उन्होंने पारिस्थितिकीय संकेतों के आधार पर बहुत प्रभावशाली वर्णन किया है। यह वर्णन बहुत कल्पनाशील है, लेकिन पारिस्थितिकीय साक्ष्यों से बंधा हुआ। (मुक्तिबोध का इतिहास बोध, 363)

प्रस्तुत कहानी में भी इस समाजशास्त्रीय ब्योरे को रखते हुए वे कथा की संवेदनात्मक गति को प्रगाढ़ ही करते हैं कि किस तरह अपने आत्म-पराएपन की घुटन और बेचैनी से जूझते हुए कथा के पात्र इन इलाकों में घूम रहें हैं। इस आत्म-पराएपन का एक पहलू यह भी है कि महफ़िलों में शरीक होने वाले लोग बॉस में अपने समान कोई न कोई गुण देखकर अपने प्रति बॉस की प्रसन्नता के लिए आश्वस्त होकर अपने अलगाव को छिपाना चाहते हैं। वे बॉस में अपनी प्रतीकात्मक पहचान खोजते हैं। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 216) तो वहीं जगत, वाचक और मिस्टर भनावत अपनी अलग-अलग जीवन-दृष्टियों के बावजूद अपने पराएपन से जूझते हुए इन इलाकों में घूमते हैं। इस क्रम में भनावत के माध्यम से बॉस की आलोचना करते मुक्तिबोध पराएपन के भौतिक यथार्थ को उजागर करने का प्रयास करते हैं। भनावत यह बखूबी पहचानता है कि

शैतान इसलिए दूसरे पर मेहरबानी करता है कि वह भी शैतानी ढाँचे में फिट हो। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 220)

यह शैतान पूंजी ही है जैसा कि भनावत स्पष्ट करता है जो व्यक्ति-स्वातंत्र्य के माध्यम से हमें और हमारे पूरे अस्तित्व को ही परिसीमित कर देती है। हम श्रम के घंटों के साथ अपना सब कुछ बेच डालते हैं। मुक्तिबोध हालाँकि संवेदनात्मक गति, दृश्यात्मक दिशा तथा अध्ययनशीलता के कलात्मक समन्वयन से ही पाठक को गतिमय रखते हैं लेकिन तब भी कथ्य के परिवर्तनों (transitions) में वैचारिक रूप से गंभीर निबंधात्मक कथन देखें जा सकते हैं। कुछ कहानियों में इन निबंधात्मक कथनों की बहुलता के कारण ही संजीव कुमार मुक्तिबोध को कथाकार मानने से इनकार करते हैं। (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 218) वे क्लॉड ईथरली जैसी कहानियों को भी मुक्कमल कहानी इसलिए नहीं मानते क्योंकि उनके अनुसार इस कहानी में अंतर्निहित पद्धति निबंधात्मक है।

हमारा मानना है कि यह उनके विवेचन की सीमा है कि वे तयशुदा वर्गीकरणों की सतह से आलोचनात्मकता और रचनात्मकता पर विचार करते हैं। संभवत: उनके लिए रचनात्मक आलोचना और आलोचनात्मक रचनात्मकता जैसी प्रक्रियाओं की कोई प्रासंगिकता मालूम नहीं होती तभी वे क्लॉड ईथरली की पद्धति में अंतर्निहित स्वप्न-तकनीक पर ध्यान नहीं देते। न ही इस कहानी में पूंजी और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के वैचारिक निरूपण से इतर उन्हें इसका कोई रचनात्मक निरूपण ही दिखता है जहाँ मुक्तिबोध पूंजीवादी समाज के अलगाव को प्रस्तुत करने के लिए देवकीनंदन खत्री के तिलिस्म को प्रस्तुत करते हैं जोकि प्रस्तुत कहानी में पूंजी का ही तिलिस्म मालूम होता है। (मुक्तिबोध रचनावली 3, 228) संजीव कुमार की समस्या यही है कि वे विधा के तयशुदा दायरों में ही मुक्तिबोध के गद्य का मूल्यांकन करना चाहते हैं। तभी उन्हें लगता है कि क्लॉड ईथरली यदि डायरी या निबंध होती तो अधिक स्वाभाविक था। (निबंधात्मक कहानियाँ या कथात्मक निबंध?, 219) यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि क्लॉड ईथरली में देशी पान की दुकान और विक्टोरियन वास्तु-कला का संघनन न होता तो क्या कथात्मक प्रभाव उतना ही तीक्ष्ण होता? क्या मुक्तिबोध पूंजीवादी सभ्यता के माध्यम से वैश्विक होती दुनिया का पूर्वरेखांकन कर पाते जहाँ उनके अनुसार “हम किसी एक देश के नहीं हैं, सभी देशों के हैं।” (मुक्तिबोध रचनावली 3, 157)

दूसरी ओर संजीव कुमार के पाठ के द्वारा हम मुक्तिबोध की डायरी के प्रकटत: कथात्मक पक्ष को भी समझने में असफल ही होंगे। उनका पाठ हमें उभरती हुई नई विधाओं की किसी सामाजिक भाषा को समझने की ओर प्रवृत्त नहीं करता जोकि रेमंड विलियम्स के अनुसार नई सांस्कृतिक परिस्थितियों के पुनर्निर्माण का परिणाम है। (Marxism and Literature, 185) मुक्तिबोध अपने समय में इन नई सांस्कृतिक परिस्थितियों को आकार लेते हुए देख रहे थे। गौरतलब है कि वे एक ओर पारंपरिक प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन की सीमाओं को उजागर कर रहे थे तो दूसरी ओर नई कविता के आंदोलनात्मक उभार से भी वह पूर्णत: संतुष्ट नहीं थे। शीत-युद्ध के सांस्कृतिक परिदृश्य से संघर्ष करते हुए वे चूक चुकी प्रगतिशीलता की वारदात (Event) का नई कविता में पुनरारंभ करना चाहते थे। अत: इन ऐतिहासिक संदर्भों के इर्द-गिर्द न केवल एक साहित्यिक की डायरी की उत्पादन-प्रक्रिया को देखना ज़रूरी है बल्कि उसकी विधा और रूप पर विचार करना भी उस काल के बनते-बिगड़ते सांस्कृतिक परिदृश्य और डायरी की विधा की सामाजिक-भाषा को समझने के लिए सार्थक होगा। यहाँ हमारी कोशिश मुक्तिबोधीय साहित्य में इस सामाजिक भाषा के निर्माण की भौतिक प्रक्रिया का उत्खनन करना है। 

निबंधों में कथात्मकता का हस्तक्षेप

विपात्र की ओर लौटें तो यह स्पष्ट करना ज़रूरी लगता है कि वैचारिक और निबंधात्मक कथनों की बहुलता के बावजूद यहाँ पाठक शिक्षा-केंद्र में पात्रों के जीवन के प्रति संवेदनात्मक जुड़ाव के कारण ही कथ्य में उतरते चले जाने के लिए अपनी जिज्ञासु वृत्ति से संचालित होता है। यह जिज्ञासा विचारों में उतरने की जिज्ञासा नहीं है बल्कि भावात्मक रूप से कथात्मक दिशा से जुड़ी जिज्ञासा है। एक साहित्यिक की डायरी में कथात्मक या फिक्श्नल परिवेश होने के बावजूद क्या जिज्ञासा की यही भूमिका है? अत: यहाँ डायरी में कथात्मक या फिक्श्नल प्रवृत्तियों को देख लेना ज़रूरी लगता है। वैभव सिंह अपने लेख में डायरी में कथाशैली के प्रयोग पर विचार करते हैं।

वे लिखते हैं,

डायरी में मुक्तिबोध ने कथाशैलियों का अगर सहारा लिया है तो इसका कारण संभवत: यह है कि मुक्तिबोध के मन में उठने वाले तीव्र कल्पनाचित्र उन्हें सिद्धांतनिरूपण की शुष्क ज़मीन पर ज़्यादा देर तक टिकने नहीं देते थे। (Marxism and Literature, 195)

लेकिन जैसा कि हम देखते हैं कि मुक्तिबोध की डायरी के निबंधों में सैद्धांतिकी भी विकसित होती है जिसकी स्पष्ट मिसाल कला के तीन क्षण की परिष्कृत अवधारणा है। सिंह डायरी में क्लासिकल कथाशैली को तीसरा क्षण नामक निबंध में देखते हैं, जिसे वे डायरी का पहला निबंध बताते हैं। उनके पाठ की समस्या यह है कि वे डायरी के तैयार स्वरूप पर विचार करते हैं लेकिन द्वंद्वात्मकता की उस प्रक्रिया को नहीं देखते जहाँ डायरी अपनी स्वायत्त विधा को विकसित करती है। अत: वे यह नहीं देखते कि मुक्तिबोध किस तरह फिक्श्नलाइज्ड नॉन-फिक्श्न की विधा तक पहुँच बनाते हैं।

नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित डायरी का जो प्रारूप हमें प्राप्त होता है उसमें नया ख़ून में प्रकाशित पहला निबंध जहाँ दिसंबर 1955 का है तो वहीं दो अपूर्ण निबंध 1950 तथा 1954 के मिलते हैं। दो पात्रों के बीच संवाद की कथाशैली की मौजूदगी करुणा और यथार्थ तथा वाद का घेरा जैसे निबंधों से स्पष्टत: प्रकट होने लगती है। बीच-बीच में यह संवादी कथाशिल्प टूटते हुए शुद्ध निबंध का रूप भी लेता दिखाई देता है, मसलन कलम की हम्माली जैसा निबंध। अप्रैल 1957 के निबंध सड़क को लेकर एक बातचीत में संवादी कथाशिल्प से आगे बढ़ते हुए साहित्यिक भाषा की फिक्श्नल प्रवृत्ति उभर कर सामने आती है जो निबंध में साहित्यिक वर्णन को कथात्मक रंग प्रदान करती मालूम होती है।

इंदौर में मेरे घर के पड़ोस में सेमल का एक ऐसा विशाल शतभुज वृक्ष था जिस पर हज़ारों कौवे बैठे रहते। सुबह आँख खुलते ही कौवों की विचित्र कांव-कांव कानों में समा जाती। शाम को जब आसमान की लाली संवलाने लगती तो उनकी पुकार में एक अजीब उदास तेज़ी आ जाती। लगता कि मन के भीतर जो कुछ दबा-दबा है—वह सम्मिश्र, अस्पष्ट, औघड़, कर्कश शब्द स्वरों में बाहर एकदम निकलना चाहता है। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 32)

निबंध की इन शुरुआती पंक्तियों से ऐसा लगता है कि जैसे हम किसी कथालोक में उतर रहे हैं लेकिन यह कथालोक एक मरीचिका ही मालूम होती है जब पात्रों के संवाद गंभीर विचारों को प्रकट करने लगते हैं। ऐसा नहीं है कि मुक्तिबोध केवल शुरू में ही कथात्मक परिवेश की मरीचिका के विधान के लिए ऐसी भाषा प्रयोग में लाते है बल्कि वे सौंदर्य के रहस्यात्मक चौखटे के वैचारिक विवरण के क्रम में भी ऐसे वर्णनों को ले आते हैं। नए की जन्मकुंडली: एक का यह वर्णन इस लिहाज़ से दृष्टव्य है,

सामने पीपल का वृक्ष है। चाँदनी में उसके पत्ते चमचमाते काँप रहे हैं। चाँदनी और उसमें चित्रित हुई छायाएँ हमारे मनोलोक को एक नई दिशा दे रही हैं। मुझे मालूम था कि मेरे मित्र के लिए शैले की ‘ओड टु वैस्ट विंड’ उतनी ही दूर है जितना कि मेरे लिए ‘स्कवेअर रूट ऑफ माइनस वन’ लेकिन इसके बावजूद ये दूरियाँ हमारी पहचानी हुई थीं, और शायद इसीलिए वे प्रिय भी थीं। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 37)

इसी तरह संवादों के रूप में पात्रों के बीच हो रही गंभीर सैद्धांतिक चर्चा के बीच मुक्तिबोध एक फिक्श्नल झटका देकर पड़ताल के लिए पाठक की जिज्ञासा को ओर तीव्र कर देते हैं। संयुक्त परिवारों के ह्रास की वैचारिक चर्चा से पड़ताल की ज़रूरत के संक्रमण को संभव करने के लिए वे प्रकटत: फिक्श्नल परिवेश को ही प्रयोग में लाते हैं।

चारों ओर चाँदनी की रहस्यमय मधुरता फैली हुई थी। चारों ओर ठंडा एकांत फैला हुआ था। मेरी अजीब मन:स्थिति हो गई। मैं अपने पड़ोसियों की ज़िंदगियाँ ढूँढ़ने लगा, अपने परिचितों का जीवन तलाशने लगा। एक अनिच्छित बेचैनी मुझमें फैल गई। हाँ, यह सही है कि ज़िंदगी और ज़माना बदलता जा रहा था। किंतु मैं परिवर्तन के परिणामों को देखने का आदी था, परिवर्तन की प्रक्रिया को नहीं। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 39, स्वारेखांकन)

यह गौरतलब है कि यहाँ मुक्तिबोध सामाजिक पड़ताल और आत्म की पड़ताल को एक ही प्रक्रिया के दो अविभाज्य पहलुओं के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। क्या यह आत्मालोचन या अवलोकन, निबंध की प्रकटत: कथात्मक प्रवृत्ति के कारण और भी मारक नहीं हो जाता जहाँ पाठक के समक्ष सीधे लेखक नहीं बल्कि कथा के एक पात्र का चरित्र अपने अंतर्विरोधों के साथ मूर्तिमान हो उठता है? इस तरह की कितनी ही मिसालें हमें विभिन्न निबंधों में प्राप्त होती हैं जो डायरी को एक फिक्श्नल रंग देती हैं। कहीं किसी निबंध में मंदिरों वातावरण के इर्द-गिर्द जंगली वृक्षों के बबूलपन के बीच मुक्तिबोध दो पात्रों को बिठाते हैं तो कहीं पात्र जंगल-जंगल घूमते हुए वन्य-प्रदेशों का अनुसंधान करते हैं।

निबंध तीसरा क्षण इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ मुक्तिबोध और केशव (काल्पनिक चरित्र) का संबंध बीस सालों के लंबे काल में फैला हुआ है और इस विधा की प्रकटत: कथात्मकता ही इस निबंध की गहन वैचारिक प्रक्रिया को एक साँचा या फ्रेम प्रदान करती है। सौंदर्य और रचना-प्रक्रिया जैसे सैद्धांतिक विषयों पर केंद्रित लगभग 19 पृष्ठ लंबे इस निबंध को मुक्तिबोध कथा की फिक्श्नल प्रवृत्ति से ही गतिमय रखते हैं। जहाँ एक ओर परिवेश का साहित्यिक तथा रचनात्मक वर्णन इसमें सहायता करता है तो वहीं पात्रों के संवाद वैचारिक प्रक्रिया को परिष्कृत करते हैं। सौंदर्य की अवधारणा पर आने से पूर्व मुक्तिबोध प्राकृतिक सौंदर्य के रचनात्मक वर्णन द्वारा एक माहौल तैयार करते हैं जिस आधार पर आगे निबंध की वैचारिक अवधारणा विकसित होती है।

साँझ पानी के भीतर लटक गई थी। संध्या तालाब में प्रवेश कर रही थी। लाल-भड़क आकाशीय वस्त्र पानी में सूख रहे थे। और मैं संध्या के इस रंगीन यौवन पर उन्मत्त हो उठा था। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 77)

इस निबंध और डायरी के कितने ही छोटे-छोटे वाक्य जीवंत बिंबों को मूर्तिमान करते हुए अपने आप में मुक्कमल फिक्श्न की इकाई मालूम होते हैं। मसलन,

वृक्षों के समीप धूप अलसा रही थी। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 78)

इसी तरह केशव द्वारा सौंदर्य की मादक अवर्णनीय शक्ति की व्याख्या से ठीक पहले आता यह वर्णन मन में एक गतिशील बिंब बनाता है जैसे हम किसी कथालोक में उतर रहे हों,

…शाम साँवली हो गई। वृक्ष अँधेरे के स्तूप व्यक्तित्व बन गए। पक्षी चुप हो उठे। एकाएक सब ओर एक स्तब्धता छा गई। और, फिर इस स्तब्धता के भीतर से एक चंपई पीली लहर ऊँचाई पर चढ़ गई। कॉलेज के गुंबद पर और वृक्षों के ऊँचे शिखरों पर लटकती हुई चाँदनी सफ़ेद धोती-सी चमकने लगी। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 77)

यह सभी वर्णन पाठक की संवेदना को स्पर्श करते हुए गुज़रते हैं। वह निबंध में कविता की अनुपस्थित उपस्थिति को अनुभूत करता है। काव्य की यह अनुपस्थित उपस्थिति ही डायरी में संवेदना का फिक्श्नल टच है। इसी फिक्श्नल टच के कारण मुक्तिबोध को इस निबंध में फिक्श्न से नॉन-फिक्श्न में संक्रमण करते हुए कोई ख़ासी दिक्कत नहीं होती बल्कि वे फिक्श्नल परिवेश की सहायता से वैचारिक नॉन-फिक्श्न तक पहुँचते है। मसलन इसी निबंध में केशव की भेजी उस चिट्ठी का वर्णन जो मुक्तिबोध के अनुसार चिट्ठी नहीं थीसिस थी। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 90)

कहना न होगा कि पत्र की पृष्ठ संख्या कोई पचीस थी। बारीक सुडौल अक्षर, सुंदर-स्वच्छ-लिखावट, और जहाँ आवश्यक हों वहीं-वहीं पैरे—इस प्रकार से शोभायान वह चिट्ठी थी, या चिट्ठी का बाप ‘चिट्ठा’ था—नहीं कह सकता। (मुक्तिबोध रचनावली 4, 91)

ध्यातव्य हो कि इसी चिट्ठी की वैचारिकी द्वारा मुक्तिबोध केशव के हस्तक्षेप से कला के तीन क्षण की अवधारणा को और परिष्कृत करते हैं। निस्संदेह इस फिक्श्नल प्रवृत्ति के बावजूद यह बुनियादी रूप से निबंध ही है लेकिन इस दिशा में मुक्तिबोध फिक्श्न और नॉन-फिक्श्न के सरलीकृत और मिथ्या द्वैत को विसर्जित करते मालूम होते हैं। जिस तरह विपात्र या क्लॉड ईथरली अपनी निबंधात्मकता के बावजूद मूलत: कहानियाँ हैं उसी तरह डायरी अपनी कथात्मकता के बावजूद मूलत: निबंधात्मक है। लेकिन यहाँ कथा और निबंध का सरलीकृत द्वैत नहीं है।

डायरी के निबंधों की प्रकटत: कथात्मकता को मुक्तिबोध सचेतन रूप से विकसित कर रहे थे। 18 अक्तूबर 1957 को प्रमोद वर्मा को भेजे गए एक पत्र में वे स्वयं डायरी के निबंधों को निबंध के रूप में नहीं देखते।

आपने डायरी के बारे में लिखा, उससे नि:संदेह खुशी हुई। चूंकि मेरे पास यहाँ, वस्तुत: कोई नहीं है जो एकदम कुछ constructive सुझाव दे सके, इसलिए मैं बहुत डरते-डरते लिखता हूँ। बहुत बार वह मन लायक बन भी नहीं पाती। कभी लगता है उसे बड़ा कर दूँ। लेकिन, फिर प्रतीत होता है कि कहीं वह निबंध न हो जाए। (मुक्तिबोध रचनावली 6, 374)

यहाँ मालूम होता है कि डायरी बुनियादी रूप से मुक्तिबोध की दृष्टि से उनके अपने कलात्मक प्रयासों की चिंतनशील पड़ताल है। कहना न होगा कि मुक्तिबोध की यह चिंतनशील पड़ताल उनके रचनात्मक लेखन में भी सक्रिय रहती है।

अडोर्नो अपने महत्त्वपूर्व लेख दी एस्से एज़ फॉर्म में निबंध को पूर्वनिर्धारित सांस्कृतिक वस्तुओं की विशिष्ट तथा चिंतनशील पड़ताल के रूप में परिकल्पित करते हैं। इस दिशा में, अडोर्नो निबंध की सौंदर्यात्मक स्वायत्ता की ओर ध्यान दिलाते हैं जोकि कला से गृहीत नहीं बल्कि अपने अवधारणात्मक चरित्र से चालित है। इस लिहाज़ से निबंध का सत्य कला का सौंदर्यात्मक सादृश्य नहीं बल्कि अपनी अवधारणात्मक गतिमयता से व्यवस्था की अंतर्भूतता के असत्यत्व को सामने लाना है। यह स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि चूंकि व्यवस्था की अंतर्भूतता ऐतिहासिक रूप से निर्धारित है अत: निबंध सांस्कृतिक वस्तुओं पर चिंतनशील पड़ताल करते हुए किसी अतींद्रिय कर्ता की ओर संकेत नहीं करता बल्कि उसका सत्य-तत्त्व अपने आप में ऐतिहासिक है।

अडोर्नो बताते हैं कि निबंध प्रस्तुतीकरण के विषय को बहुत गंभीरता से लेता है। वह अवधारणा की उस जड़ीभूतता को तोड़ता है जो उसको परिभाषाओं में परिसीमित करती है[1]। इससे उलट वह बौद्धिक अनुभव की प्रक्रिया में अपने में अंतर्निहित अवधारणाओं की अन्योन्याश्रित अंत:क्रिया पर ज़ोर देता है। इसी माध्यम से निबंध अवधारणाओं के कालीन को बुनता है और चिंतनशील पड़ताल को संभव बनाता है। अडोर्नो के अनुसार चिंतक विचार नहीं करता बल्कि वे बिना कुछ सरलीकृत किए बौद्धिक अनुभव के अखाड़े में अपने को खुला छोड़ देता है। इस तरह अडोर्नो बौद्धिकता को स्थैतिक नहीं बल्कि गतिमय बताते हैं। बौद्धिकता की यह गतिमयता इस ओर संकेत करती है कि निबंध का अर्थ ही अपने होने पर विचार करते चलना है। इसी कारण निबंध का परिघटनात्मक प्रकटन अर्थात उसका स्थैतिक गुण भी तनावों से परिपूर्ण होता है। यही तनाव निबंध के विन्यास को सींचते हैं।

सवाल उठता है कि मुक्तिबोधीय हस्तक्षेप के संदर्भ में डायरी के निबंधों में इस विन्यास को हम किस तरह समझ सकते हैं? जैसा कि बताया जा चुका है कि मुक्तिबोध की डायरी के निबंधों का विन्यास अर्थात उसकी विधा की सामाजिक-भाषा उनके समय के बनते-बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य से सीधा संबंध रखती है। मुक्तिबोध के सामने प्रगतिशीलता और नई कविता का सवाल था, सौंदर्यानुभूति का विषय था, रचना-प्रक्रिया की जटिलता थी तथा शीत-युद्ध की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि थी। मुक्तिबोध इन्हीं सवालों, विषयों, समस्याओं तथा पृष्ठभूमि के इर्द-गिर्द ही अपनी डायरी के रचना-कर्म में प्रवृत्त होते हैं। (त्रिपाठी, ‘एक साहित्यिक की डायरी’ पर कुछ नोट्स 341) उनके निबंधों का विन्यास इन्हीं सवालों और विषयों से जुड़ते और टकराते हुए बनता है।

यह सभी सवाल और विषय डायरी के निबंधों में अवधारणाओं के रूप में एक दूसरे को सहयोग देते हुए एक मोनाड के रूप में विकसित होते हैं। अडोर्नो बताते हैं कि अपनी निरीक्षण की वस्तु पर विचार करते हुए निबंध वस्तु के रूप का अनुकरण नहीं करता बल्कि अपने बौद्धिक अनुभव के अवधारणात्मक संगठन से उस सांस्कृतिक वस्तु को अपने निरीक्षण से एक नया आकार और रूप देता है[2]

अपने अवधारणात्मक संगठन से निबंध वस्तु में उन तत्त्वों को तलाशता है जोकि वस्तु का जीवन या सार है। चूंकि सार-तत्त्व सतत् प्रवाह है अत: इस सतत् प्रवाह को रूप देने के लिए निबंध अपने स्व-पक्षीय उद्यम से एक नई वस्तुनिष्ठता गढ़ता है।

अवधारणात्मक रूप से वह उसको फाड़कर  खोलना चाहता है जोकि अवधारणाओं द्वारा अवशोषित नहीं हो सकता, या जोकि, अंतर्विरोधों के माध्यम से—जिसमें अवधारणाएँ अपने को उलझा लेती हैं—इस तथ्य को धोखा देता है कि उनके वस्तुनिष्ठता का संजाल शुद्ध रूप से एक आत्मगत भावोत्तेजन है[3](वही 170, स्वानुवाद)

ध्यातव्य हो की मुक्तिबोध नई कविता के विन्यास में प्रगतिशीलता की नई वस्तुनिष्ठता गढ़ना चाह रहे थे। पारंपरिक विचार से उलट निबंध बौद्धिक अनुभव को नहीं भूलता बल्कि निबंध की इस विशेषता पर ध्यान दिलाते हुए अडोर्नो लिखते हैं, “उसकी सभी अवधारणाएँ इस तरह से प्रस्तुत करने योग्य होती हैं कि वे एक दूसरे को सहयोग देती हैं, कि प्रत्येक अवधारणा अपने-आप को उस विन्यास के अनुसार ग्रंथित करती है जोकि वह अन्यों के साथ बनाती है। निबंध में विवेकशील रूप से पृथक्कृत तत्त्व/अवयव एक पठनीय संदर्भ में प्रवेश करते हैं;  वह कोई मचान, कोई प्रासाद खड़ा नहीं करता[4]।” (वही 161, स्वानुवाद)

एक साहित्यिक की डायरी की विधा की सामाजिक भाषा को समझने के लिहाज़ से यह विचार अहम हो सकता है। अपने बदलते हुए सांस्कृतिक परिदृश्य में मुक्तिबोध देख रहे थे कि किस तरह द्वंद्वात्मकता की प्रक्रियात्मक एकात्मकता की जगह मिथ्या द्वैतों पर ज़ोर दिया जा रहा था। अपनी आलोचना में सतत् प्रक्रियात्मकता पर ज़ोर देते हुए मुक्तिबोध इन मिथ्या द्वैतों को प्रश्नांकित करते हैं। उसके विविध संस्तरों को तोड़ते हैं।

अपने गद्य लेखन में मुक्तिबोध कथा और निबंध की विधाओं का अतिक्रमण करते हुए फिक्श्न और नॉन-फिक्श्न के मिथ्या द्वैत को विसर्जित करते हैं। इसी उद्यम में वे डायरी के फिक्श्नलाइज्ड नॉन-फिक्श्न के प्रयोगात्मक फॉर्म को विकसित करते हैं। संजीव कुमार का पाठ इस फॉर्म की संभाव्यता की ओर हमें नहीं ले जाता। इससे उलट अपूर्वानंद की रीडिंग हमारे लिए यहाँ मददगार हो सकती है। वे बखूबी समझते हैं कि मुक्तिबोध की रचनात्मकता को पारंपरिक विधाओं के ढाँचे में रखकर नहीं समझा जा सकता। वे लिखते हैं,

मुक्तिबोध जो एक बात कहना चाह रहे थे उसके लिए न सिर्फ प्रचलित रूप अपर्याप्त थे, विधा भी रुकावट बन गई लगती थी। इसलिए विधाओं की सीमा का वे अतिक्रमण कर रहे थे। …एक साहित्यिक की डायरी हो या विपात्र या क्लॉड ईथरली: इन रचनाओं को पूर्व परिभाषित विधा की श्रेणी में रखना कठिन है। (व्याकुल क्षितिज का व्योम, 12)

दिलचस्प बात यह है कि अपूर्वानंद भी इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि मुक्तिबोध अपने कलात्मक प्रयास से अभिव्यक्तियों के विविध रूपों-स्वरूपों से वस्तुनिष्ठता के नए ऑर्डर को गढ़ते है जिसकी गैर-मौजूदगी उन्हें अपने समय के रचना और आलोचना जगत में खलती है।

मुक्तिबोध जो कर रहे हैं, वह है निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता, दर्शन आदि को मिला कर या उन्हें एक दूसरे से टकरा या पिघलाकर अपने कारखाने में कुछ एक नया गढ़ना। (व्याकुल क्षितिज का व्योम, 12-13)

अभिव्यक्तियों के विविध रूपों-स्वरूपों और विधाओं की आपसी टकराहट और पिघलाहट के चिह्न हमें क्लॉड ईथरली, विपात्र, अँधेरे में तथा एक साहित्यिक की डायरी जैसी कृतियों में स्पष्टत: मिलते हैं। एक साहित्यिक की डायरी की विशिष्टता इन सब में यह है कि वह टकराहट और पिघलाहट की इस प्रक्रिया की गहन पड़ताल रचनात्मक ढंग से करती है। यह रचनात्मक ढंग ही डायरी का विकसित होता रूप है। यह रूप का सक्रिय निर्माण है। रेमंड विलियम्स रूप के इस सक्रिय निर्माण को अभ्यास के सत्य के रूप में देखते हैं। (Marxism and Literature, 186) अत: यह स्पष्ट है कि आलोचना में रचनात्मकता और रचना में आलोचनात्मकता के अपने इस ज़ोर के कारण ही मुक्तिबोध रचनात्मक नॉन-फिक्श्न की विधा को संभव बना पाते हैं। इस तरह एक साहित्यिक की डायरी की यह विधा या फॉर्म अभ्यास के सत्य के रूप में प्रस्थापित होती है।

***

[1] परिभाषाओं में निहित अस्मितावादी दृष्टिकोण का क्रिटीक करते हुए अडोर्नो अपनी पुस्तक ‘नेगेटिव डाइलेक्टिक्स’ में अवधारणा में अंतर्निहित गैर-अवधारणा की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनके लिए द्वंद्वात्मकता, अनस्मिता का सुसंगत बोध है। उनके लिए अंतर्विरोध, अस्मिता के पक्ष के भीतर अनस्मिता की मौजूदगी है। (Negative Dialectics, 5) इस तरह अंतर्विरोध, अस्मिता का असत्यत्व है जो बताता है कि संबंधित अवधारणा पूरी तरह से विषय-वस्तु को प्रस्तुत या प्रकट नहीं कर पायी है। इसी अर्थ में अडोर्नो के लिए हर अवधारणा, बल्कि दार्शनिक अवधारणा भी गैर-अवधारणा की ओर संकेत करती है। अत: गैर-अवधारणा के रूप में अनस्मिता यथार्थ के अंतर्विरोध का मूल है, इसीलिए अडोर्नो के लिए नकारात्मक द्वंद्वात्मकता अनस्मिता पर निर्भर है। अडोर्नो  के लिए द्वंद्वात्मक रूप से आगे बढ़ने का अर्थ अंतर्विरोधों में विचार करना है, इस बारे में वे लिखते हैं, “द्वंद्वात्मक रूप से आगे बढ़ना, वस्तुओं में अनुभूत होने वाले अंतर्विरोध के लिए और उस अंतर्विरोध के खिलाफ अंतर्विरोधों में विचार करना है।  यथार्थ में एक अंतर्विरोध, यथार्थ के खिलाफ एक अंतर्विरोध है।” (वही, 145, स्वानुवाद) यथार्थ के अंतर्विरोध, तथा अवधारणा में अंतर्निहित गैर-अवधारणा का अनुसंधान, विचार का कार्य है। ध्यातव्य हो कि आनुभविक या सामाजिक-यथार्थ का आभ्यंतरीकरण दरअसल एक अवधारणात्मक संरचना के द्वारा होता है जो संरचना यथार्थ का एक तरीके से बोध करने का प्रयास करती है। किन्तु, इसी बिन्दु पर यथार्थ का यह बोध, कुछ तत्त्वों को नहीं समेट पाता जोकि एक अर्थ में अबोधगम्य हैं। यह इस अर्थ में कि संबंधित अबोधगम्य, अवधारणात्मक बोधगम्यता की पकड़ से परे या उसका सतत् अधिशेष है। विचार का कौशल सामाजिक या आनुभविक तथ्य की संरचना में सन्निहित नकारात्मकता को उजागर करने के लिए यथार्थ के वास्तविक अथवा अबोधगम्य का अनुसंधान करता है।

[2] “वह एक अकाट्य सृजन बनता है जोकि वस्तु का अनुकरण नहीं करना चाहता बल्कि उसके अवधारणात्मक बिखरे टुकड़ों से उसका पुनर्सृजन करता है।” (वही 169, स्वानुवाद) “It becomes a compelling construction that does not want to copy the object, but to reconstruct it out of its conceptual membra disjecta.”

[3] “Conceptually it wants to blow open what cannot be absorbed by concepts, or what, through contradictions in which concepts entangles itself, betrays the fact that the network of their objectivity is a purely a subjective rigging.”

[4] “All of its concepts are presentable in such a way that they support one another, that each one articulates itself according to the configuration that it forms with the other. In the essay discreetly separated elements enter into readable context; it erects no scaffolding, no edifice.”

Share This Article
Leave a review