फ़िल्मइंडिया, जून 1943 में प्रकाशित इस भेंटवार्ता को अभिलेखागार से निकालकर रोशनी दिखाने और उस पर औपचारिक चर्चा करने का श्रेय मोहिमार्नब बिश्वास को दिया जाना चाहिए। हिन्दी सिनेमा के हमारे उस्ताद रवि वासुदेवन ने अपने जर्नल बायस्कोप में छपे बिश्वास के इस लेख की ओर मेरा ध्यान खींचा और अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के डॉ. संदीप मधुकर सपकाले ने इस बातचीत के बारे में वहीं आयोजित एक गोष्ठी में चर्चा की। जब मैंने फ़िल्मइंडिया के अपने संग्रह में खोजा तो पाया कि वह अंक तो मौजूद है, लेकिन ख़ास वही पन्ने ग़ायब हैं! ज़ाहिर है कि फ़िल्मइंडिया के मशहूर व बदनाम संपादक बाबूराव पटेल द्वारा दान की गई पत्रिका की जो फ़ाइलें राष्ट्रीय फ़िल्म अभिलेखागार में हैं, वहाँ से किसी ने बड़ी सफ़ाई से इन्हीं पन्नों को ग़ायब कर दिया है, या पटेल के अपने ज़माने में ही किसी ने उसे अंक से अलग कर दिया था; या फिर किसी को ये पन्ने इतने मूल्यवान लगे कि उन्हें दुनिया की नज़रों से महफ़ूज़ रखने का अपनी समझ से स्थायी बंदोबस्त कर गया!
बहरहाल, यह एक वजह हो सकती है कि इस पर शोधार्थियों का ध्यान अब तक नहीं गया था। भला हो मीडिया हिस्ट्री डिजिटल लायब्रेरी के ज़ख़ीरे पर रखी किंचित बेहतर प्रतियों का, कि हम इसे ढंग से पढ़ पाए, और फ़ौरन ज़ाहिर हो गया कि कई अन्य क्षेत्रों की तरह सिनेमा पर सोचने के मामले में भी डॉ. आंबेडकर अपने दौर के चिंतक नेताओं से मीलों आगे थे। हालाँकि उन्होंने ख़ुद को किताबों का बेहद पढ़ाकू क़िस्म का पाठक, और उतनी ही विनम्रता से, अंतरात्मा की आवाज़ से मजबूर होकर कभी-कभार उन्हें लिख डालने वाला लेखक माना है। एक ऐसा इंसान जिसने एक दर्जन से ज़्यादा फ़िल्में शायद ही देखी होंगी, इसलिए फ़िल्मों पर बोलने का अधिकारी तो क़तई नहीं है, लेकिन इस ‘भविष्य के माध्यम’ के प्रति अपनी उदासीनता को वह अपना ही नुक़सान मानता है। दिलचस्प है कि सिनेमा और फ़िल्मइंडिया से उनकी दूरी इससे भी ज़ाहिर है कि आंबेडकर फ़िल्मइंडिया के प्रतिनिधि को दिया हुआ समय व स्थान भूल जाते हैं, लिहाज़ा यह बातचीत भी मुंबई के एक पुस्तकालय प्रांगण में ही दर्ज हुई, जहाँ वे अपने ताज़ा शोध में मशग़ूल थे।
इससे पहले कि हम इस बातचीत के ग़ौरतलब बिंदुओं पर विचार करें, यह याद रखना ज़रूरी है कि उस समय के राजनेता सिने-सितारों से बड़े सितारे थे। फ़िल्मी स्टारडम तो बाद में बनता है। इस लेख के मुखपृष्ठ पर ख़ुद बाबासाहब का चित्र बिल्कुल फ़िल्मी सितारे की तरह छपा है, बाक़ायदा स्वहस्ताक्षरित, यानि ऑटोग्राफ़ से लैस! तीस और चालीस के दशक की फ़िल्मी दुनिया को इससे फ़र्क़ पड़ता था कि गांधी जी फ़िल्में पसंद नहीं करते, इसलिए अब्बास उनसे बाक़ायदा बहस करते हैं। दूसरी तरफ़ आज़ादी के पहले की पत्र-पत्रिकाएँ देखें तो धार्मिक, सामाजिक या देशभक्ति वाली फ़िल्मों के लिए जिन्ना साहब, अली बंधु, सरदार पटेल, सरोजिनी नायडू, आदि की अनुशंसाओं को समारोहपूर्वक और बतौर विज्ञापन छापा जाता था कि लोग बग़ैर नैतिक धर्मसंकट के फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल में तशरीफ़ लाएँ। यहाँ तक कि सन् 1955 में जब पहला फ़िल्म सेमिनार साहित्य अकादमी में आयोजित होता है, और जिसमें उस समय के बड़े-बड़े सितारे शामिल होते हैं, तो जवाहरलाल नेहरू उद्घाटन के लिए आएँगे या नहीं, इसको लेकर अख़बारों में ऊहापोह है, क़यासों का बाज़ार गर्म है। नेहरू जी न सिर्फ़ आते हैं बल्कि सिनेमा शिक्षाप्रद और बालोपयोगी हो, इसकी ताक़ीद भी करके जाते हैं।
डॉ. आंबेडकर भी सिनेमा को शिक्षा का माध्यम मानते हैं, लेकिन शिक्षा की उनकी परिभाषा विलक्षण है। वे सिरे से मूर्तिभंजक हैं, क्योंकि पारंपरिक पौराणिकों या कथावाचकों की कहानियों को फ़िल्माने के पक्ष में वे नहीं हैं, बल्कि उनके हिसाब से ‘बर्थ ऑफ़ अ बेबी’ जैसे वृत्तचित्रों के ज़रिए शारीरिक शुचिता या हायजीन से लेकर सेक्स-संबंधी ज्ञान और परिवार नियोजन तक का हुनर सीखा जा सकता है। यहाँ फ़िल्मों के पितामह दादासाहब फालके की ऐतिहासिक प्रेरणा ‘द बर्थ ऑफ़ जीसस क्राइस्ट’ और उससे उद्भूत ‘श्रीकृष्ण जन्म’ की किंवदंती स्मरणीय है। डॉक्टर साहब हर तरह के महिमामंडन व मानवों के दैवीकरण के ख़िलाफ़ हैं; वे चाहते हैं कि हर समसामयिक आंदोलन व नेता का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो, चाहे वे गांधीवादी आयोजन हों या महाड़ सत्याग्रह जैसी मूलगामी मुहिम। लेकिन इन सबसे परे यह ख़याल कि सिनेमा हमें ख़ुद पर हँसने को बाध्य करके हमारे संस्कारों की तनी हुई रस्सी को ढीली करता है, निहायत मौलिक है।
पिछली एक सदी में सिनेमा डॉ. आंबेडकर की उम्मीदों पर आम तौर पर खरा उतरा है। पढ़ें और आप ख़ुद फ़ैसला करें कि आज का सिनेमा किसे डराता है?
हाय, ये “अभागा हिन्दुस्तान”, डॉ. आंबेडकर ने कहा!
फ़िल्मों में इंसानों के दैवीकरण की निंदा की
हमारे विशेष प्रतिनिधि
डॉ. आंबेडकर से बात करने का मक़सद तरह-तरह की उपयोगी जानकारियों को अपने दिमाग़ में भरने के साथ-साथ लोगों व चीज़ों के बारे में दिलचस्प राय हासिल करना भी होता है। जब उनसे बात शुरू होती है तो वे आपको बोलने का भरपूर अवकाश देते हैं, हालाँकि आप चाहते हैं कि वे ज़्यादा बोलें, क्योंकि इसी में आपका फ़ायदा है। डॉक्टर किसी अच्छे-ख़ासे, चलते-फिरते-बोलते ज्ञानकोश से कम नहीं हैं।
विद्वान डॉक्टर के मशग़ले अत्यल्प हैं। पढ़ना उनका एकमात्र जुनून है। लिखना भी दूसरे पायदान पर ही आता है। लिखते तभी हैं जब अंतरात्मा से आवाज़ आती है। पढ़ते तो सदा रहते ही हैं। जनहित के मसलों पर उनसे सलाह-मशविरा करने का सौभाग्य मुझे मिलता रहा है, और वे अपनी तरफ़ से भी मुझे नेक सलाह देने की ज़हमत बाख़ुशी उठाते रहे हैं। अबकी बार सोचा कि क्यों न उनसे फ़िल्मों, उनके असरात, और उन्हें बनाने वालों पर बात की जाए और साथ ही उन्हें खुली छूट दी जाए कि सिनेमा पर मर्ज़ी मुताबिक़ अपनी दो टूक राय दें।
हमने दादर वाले उनके मकान पर मिलना तय किया था, लेकिन चूँकि फ़िलवक़्त अपनी किताब हिन्दुओं ने हमारे साथ क्या किया है लिखने में मसरूफ़ हैं, तो अक्सर बॉम्बे यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय में संदर्भ की टोह में व्यस्त देखे जाते हैं। ज़ाहिर है कि हमसे मुलाक़ात का वायदा उन्होंने सिरे से बिसार दिया था, जब मैंने उसी पुस्तकालय में उन्हें बुद्धिज़म पर लिखी किसी किताब में खोया पाया। ज्यों ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, उन्होंने किताब बंद कर दी, पेंसिलें वग़ैरह अपने भारी-भरकम चमड़े के थैले में डालीं, और फ़रमाया, “नीचे ही चला जाए, हम यहाँ बातचीत करेंगे तो लोग परेशान हो जाएँगे।” बहरहाल, मुझसे औपचारिक माफ़ी वग़ैरह माँगने की ज़रूरत नहीं समझी गई।
तनावग्रस्त लोगों के लिए दिलबहलाव का सामान
मेरे लिए बहुत अच्छा है कि हम फ़िल्म जैसे ताज़ा विषय पर बातचीत करेंगे, वैसे मुझे नहीं पता कि इस पर मैं कुछ पते की बात कह पाऊँगा। मेरी राय में हिन्दुस्तान में फ़िल्मों की बहुत बड़ी भूमिका होगी। दिक़्क़त दरअसल यह है कि हमारे लोग ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर हैं। उन्हें मामूली चीज़ों पर भी हँसना पसंद नहीं, ख़ुद पर तो क्या हँसेंगे, और न ही उन्हें ज़िंदगी के आनंद मज़े लूटना आता है। इस संजीदगी का मतलब यह है कि आप पर एक तनाव-सा तारी रहता है और बग़ैर किसी ख़ास मक़सद के आप अपनी ऊर्जा बर्बाद करते रहते हैं।
उनका जीवन बड़ा रूखा-सूखा है, ऊसर और वीरान, गोया किसी ने जीने को मजबूर कर रखा हो। मुझे लगता है कि धरती पर अपने जीवन को हम ईश्वर द्वारा दिया गया दंड मानते हैं। फ़िल्में हमें ज़िंदगी को देखने, उस पर हँसने, ख़ुद पर हँसने के साथ-साथ आत्मालोचन तथा आत्मालोड़न का बेहतरीन साधन मुहैया कराती हैं। फ़िल्में किसी की जेब पर भारी नहीं पड़तीं, और मेरी ख़्वाहिश है कि वे दूर-दराज़ तक, कोने-कोने में पहुँचें, क्योंकि इनकी मदद से हमारा हमेशा तना रहने वाला स्नायुतंत्र किंचित ढीला होगा, आराम पाएगा।
डॉक्टर जब हमसे बात कर रहे थे तो दो-तीन लोग वहाँ से गुज़रे, उनका अभिवादन भी किया। लेकिन उनका ध्यान उधर नहीं था, न ही उन्होंने कोई उत्तर दिया। इस व्यवहार पर मुझे अनायास हँसी आ गई, वैसी जैसी कि शरारती स्कूली बच्चों की होती है। उन्हें लगा कि मुझे भारतीयों की अति-संजीदगी वाली उनकी बात जँची नहीं। सो उन्होंने उँगली का रुख़ मेरी तरफ़ करके कहा,
तुम्हें मेरी बात का भरोसा नहीं है? लोग चाहे जो समझें, मैं ख़ुद को निहायत गंभीरता से लेता हूँ। मुझे अक्सर उलटी खोपड़ी वाला कहा जाता है। इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मेरी अपनी ज़िंदगी में विनोद का कोई स्थान नहीं। आपको क्या लगता है, मैंने पूरे जीवन में कितनी फ़िल्में देखी होंगी? एक दर्जन से अधिक तो नहीं। मुझे यह भी बख़ूबी मालूम है कि सैंकड़ों अन्य ऐसी हैं, जिन्हें देखने से मुझे फ़ायदा होता। लेकिन मैंने आनंद के एक स्रोत से ख़ुद को महरूम रखा है। कह सकते हैं कि यह एक ऐसी आत्मप्रताड़ना है जिसमें सारे हिन्दुस्तानी मुब्तिला हैं, और इस मुग़ालते के साथ कि वे जीवन की शून्यता और ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता में आस्था रखने वाले बहुत बड़े दार्शनिक हैं। मेरी पत्नी भी निहायत नेक आत्मा थी, लेकिन वह जब भी खुलकर हँसती या ख़ुशी की बातें करती तो उसे लगता कि वह गुनाह कर रही है और अपने ईश्वर के प्रति अपराधबोध से भर जाती। हम सब इसी मिट्टी से बने हैं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि फ़िल्में इस प्रवृत्ति को सुधारने में मददगार होंगी।
तो विद्वान डॉक्टर ने हमारे बीच फ़िल्मों का स्वागत यूँ किया। वे जब अपनी दिवंगता पत्नी की बात कर रहे थे तो मुझे बेसाख़्ता लग रहा था कि रूढ़ियों में पली-बढ़ी पारंपरिक भारतीय महिला की बात हो रही है।
भारतीय शिशु का जन्म?
विषय पर वापस लौटते हुए उन्होंने कहा कि फ़िल्में हमारे अवाम को शिक्षित करने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि अब तक लोगों ने ब्लैकबोर्ड का इस्तेमाल बंद करके फ़िल्में दिखाना शुरू किया है या नहीं, जिसका चलन व्यापक पैमाने पर अमेरिका और यूरोप में भी नहीं हुआ है। हाँ, रूस की बात अलग है, वहाँ तो जो भी उनसे बन पड़ रहा होगा, वे कर ही रहे होंगे।
अपने लोगों को, न सिर्फ़ बच्चों बल्कि वयस्कों को भी, न केवल शहरी बल्कि देहाती इलाक़ों में भी, शिक्षा दिए जाने की ज़रूरत है कि, मिसाल के तौर पर, वे कैसे जिएँ, अपने शरीर का ख़याल कैसे रखें, और बीमारियों को ख़ुद से दूर कैसे रखें। इस देश के फ़िल्म निर्माता अगर इस तरह की फ़िल्में बनाएँ और जनता को दिखाएँ तो वे देशहित का एक बड़ा काम संपन्न कर पाएँगे।
कुछ अरसा पहले मैंने द बर्थ ऑफ़ अ बेबी नामक एक फ़िल्म देखी थी, जो मुझे तो तालीमी और प्रचारात्मक फ़िल्म की एक उम्दा मिसाल लगी। उसमें एक भी बड़ा सितारा नहीं था, काम करने वाले लोग असली डॉक्टर, नर्स, मरीज़, पति, पत्नी, आदि थे, यानि सारे के सारे साधारण लोग। बड़ी नफ़ासत के साथ दिखाया गया था कि किशोर-किशोरियाँ, शादी से पहले या शादी के बाद, किस तरह का बर्ताव करें और अपने बच्चों की देखभाल कैसे करें। अवांछित गर्भ से निजात पाने और जनसंख्या-नियंत्रण की इससे बेहतर और प्रभावी शिक्षा नहीं दी जा सकती! कितना अच्छा हो कि कोई निर्माण कंपनी इस फ़िल्म की नक़ल करने की इजाज़त लेकर और भारतीय परिदृश्य के मुताबिक़ थोड़ी-बहुत रद्दोबदल के साथ इसका पुनर्निर्माण करे। ऐसा किया जाए तो कमाल की सामजसेवा होगी।
डॉक्टर का दुर्भाग्य
मैं किसी कोण से फ़िल्मी जीव नहीं हूँ, प्रशंसक तक नहीं। मेरे ख़याल से यह मेरी बदक़िस्मती है। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ आदतें या आस्वाद बदलना नामुमकिन होता जाता है। मेरा एकमात्र जुनून किताबें हैं। मैं अच्छा-ख़ासा, और शायद नीरक्षीरविवेकी क़िस्म का, पढ़ाकू हूँ। जब कभी अदम्य प्रेरणा या आंतरिक दबाव महसूस करता हूँ तो यदा-कदा कोई किताब लिख भी देता हूँ। लेकिन काश फ़िल्में मेरा जुनून होतीं। किताबों की तुलना में उनमें बेशक कहीं ज़्यादा असरकारी शैक्षणिक क्षमता है। ज़्यादातर लोग चीज़ों को उनकी तस्वीरों से ही सीखते हैं। जब आप फ़िल्म देखते हैं तो अपनी तमाम इंद्रियों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं, और इस तरह सीख ग्रहण करना कहीं ज़्यादा आसान और स्थायी होता है। अगर फ़िल्मइंडिया के पाठकों के लिए मेरे संदेश का कोई वज़न है तो मैं उनसे आग्रह करूँगा कि वे फ़िल्मों में गहरी और विविध प्रकार की रुचि लें, ताकि सामाजिक कल्याण और समाज सेवा के जितने फ़ायदे हम उठा सकते हैं, उठाएँ।
यहाँ मैंने अपना टुकड़ा लगाया,
क्या आपको नहीं लगता कि दमित-दलित तबक़ों के उत्थान और मुक्ति के आंदोलन के विकास पर अगर कोई आदर्शवादी और प्रगतिशील निर्माता फ़िल्म बनाए तो वह छुआछूत से निजात पाने में उम्दा प्रचारात्मक हथियार साबित होगी?
ज़रूर होंगी लेकिन हमारे निर्माता तो अब तक पौराणिक मायाजाल की बेवक़ूफ़ियों और विसंगतियों में उलझे हुए हैं, निरे इंसान को भगवान बनाने पर तुले हुए हैं। आपका प्रस्ताव वाक़ई उम्दा और स्वागतयोग्य है। कीर्त्तनकारों और कथावाचकों द्वारा सदियों से भक्तिलीन और रसलीन होकर सुनाई जा रही एकनाथ और चोखा मेला के अबूझ दैवी चमत्कार की कहानियों को जब बीसवीं सदी की तकनीक का इस्तेमाल कर इतने भव्य पैमाने पर पेश किया जाएगा, तो उससे तो अंधविश्वास ही फैलेगा। क्या ही अच्छा हो कि उसकी जगह पर हमारे निर्माता यह दिखाएँ कि दलित आंदोलन अपने मानवतावादी और धार्मिक खोल को उतारकर बाहर निकल आया है और ख़ुदमुख़्तार आंदोलन बनकर अपने लिए [जनवादी] इंसानी हक़ माँग रहा है।
अगर पर्दे पर हमारे आदर्शों का मूर्ति-भंजन किया जाए, तो मुझे यह सब देखकर भी ख़ुशी होगी। मेरा मतलब है कि राम और अन्य आदर्शों के पाखंड रेखांकित किए जाएँ और उन्हें उनके सही रंग में दिखाया जाए। पुराणादि की हमारी जितनी कहानियाँ हैं, उन्हें आधुनिक शोध के आलोक और सच्चे ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर जाँचने और संशोधित करने की ज़रूरत है। मुझे उम्मीद नहीं है कि कोई निर्माता ऐसा करके अपने मौजूदा धर्मभीरू ग्राहक वर्ग का आक्रोश झेलना चाहेगा। लेकिन हमारे आंदोलन का पाखंड खंडन करता वृत्तचित्र, या थोड़ा मुलायम बनाकर यूँ कहें, कि वी. आर. शिंदे जैसे समाज-सुधारकों तथा गाँधी, बिरला और ठक्कर-जैसे मानवतावादियों की सही नुमाइंदगी करता हुआ और महाड़ सत्याग्रह जैसे अध्यायों का फ़िल्मी निरूपण देखकर मुझे बेहद ख़ुशी होगी। सिर्फ़ हरिजन नाम से संबोधित होते रहने या दया का पात्र बने रहने से हम खिन्न हो गए हैं। हम दीगर मनुष्यों की माफ़िक़ समान अवसर चाहते हैं, और वह भी इस तरह कि संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में प्राप्त ‘अधिकार घोषणापत्र’ या ‘डेक्लेरेशन ऑफ़ राइट्स’ जैसा महज़ रस्मी या अकादमिक न बन जाए। हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक हमें आर्थिक समानता भी हासिल न हो जाए, जो कि किसी समाजवादी राज्य के अधीन और समाजवादी समाज में ही संभव है। अगर अपने आंदोलन पर मेरी मर्ज़ी से वृत्तचित्र बनाया जाएगा तो मैं उसमें इस आदर्श के लिए जगह ढूँढ़ लूँगा।
हाय, ये अभागा हिन्दुस्तान!
विद्वान डॉक्टर ने हमारे निर्माताओं के लिए कुछ उम्दा कथानक दे दिए थे, और मैंने चूँकि उनका बहुत वक़्त ले लिया था, सोच ही रहा था कि तहेदिल से शुक्रिया अदा करके उनसे विदा लूँ, कि वे अपनी सीट से उठ गए, मेरे कंधे पर हाथ रखा और फ़रमाया,
मैं फ़िल्मों के एक निहायत अहम पहलू पर कुछ कहना चाहता हूँ। फ़िल्मों का मज़ा थिएटर में बैठकर लेना चाहिए। पैसे देकर मनोरंजन हासिल करने का अधिकार हर किसी को है। लेकिन उससे ज़्यादा का दावा किसी को नहीं करना चाहिए।
मैं जानना चाह रहा था कि वे आजकल किस नई चीज़ पर काम कर रहे हैं। उनकी व्यंजना की धार तीखी हो रही थी, जो सामान्य बात है, और ऐसे मौक़ों पर उनकी शक्ल अजीबोग़रीब हो जाती है, हाथ पैंट की जेब में चले जाते हैं, दृष्टि आप पर टिक जाती है, वाणी स्थिर हो जाती है, मानो उचारे गए हरेक शब्द पर बलाघात डाल रहे हों।
उनकी बातें जारी रहीं,
टिकट ख़रीदने का मतलब यह नहीं कि आपको अपनी सीट के सामने पान की पीक थूकने का हक़ मिल गया है, और न ही इसका कि आप अपने दोस्त से अनर्गल गप्प मारते रहें भले ही बाक़ी लोग कुढ़ते रहें; शो के ऐन बीच खान-पान का कार्यक्रम चलाते रहें भले ही अन्य दर्शकों के कपड़े ख़राब हों या उनके आनंद में ख़लल पड़े। ये चीज़ें तभी बंद होंगी जब सार्वजनिक जगहों पर किस तरह का व्यवहार किया जाए, इसकी आचार संहिता विकसित हो। आपने देखा होगा कि हर हॉल में ‘धूम्रपान निषेध’ की तख़्ती लगी होती है, लेकिन लोग उस ताक़ीद को ताक़ पर रखकर शान से धुएँ के छल्ले बनाते हुए कई महिला व पुरुष दर्शकों को परेशान करते पाए जाते हैं। पाश्चात्य समाज के सामान्य क़िस्म के सदाचार और सहज सौमनस्यता हमारे यहाँ अब तक नहीं पहुँची है। हम कब तक सभ्य होंगे?
और अचानक वे मराठी में फूट पड़े,
हे देवा! तुम इस अभागे हिन्दुस्तान का क्या करने वाले हो?
भूमिका व अंग्रेजी से अनुवाद : रविकांत
(रविकांत विकासशील समाज अध्ययन पीठ, दिल्ली में प्रोफ़ेसर हैं और महत्त्वपूर्ण शोध-पत्रिका प्रतिमान के संपादक हैं। फ़िल्म-अध्ययन में विशेष रुचि रखते हैं। मीडिया की भाषालीला पुस्तक के लेखक एवं अनेक पुस्तकों के संपादक हैं।)