डायरी की विधा से मुक्त डायरी: एक साहित्यिक की डायरी

मुक्तिबोध कृत ‘एक साहित्यिक की डायरी’ फिक्शन और नॉन-फिक्शन के सरलीकृत द्विभाजन को प्रश्नांकित करती है। कहा जा सकता है कि फिक्श्नलाइज्ड नॉन-फिक्श्न के प्रयोगात्मक हस्तक्षेप से मुक्तिबोध इस डायरी…

सिनेमा पर डॉ. आंबेडकर

अगर पर्दे पर हमारे आदर्शों का मूर्ति-भंजन किया जाए, तो मुझे यह सब देखकर भी ख़ुशी होगी। मेरा मतलब है कि राम और अन्य आदर्शों के पाखंड रेखांकित किए जाएँ…

महाश्वेता देवी का आदिवासी संसार : आख्यान, इतिहास और उपन्यास का रचनात्मक खेल

महाश्वेता के आदिवासी कथा-साहित्य में अतीत से वर्तमान तक पसरी गरीबी, बदहाली, बंधुआगिरी, अपराधी-सा गरिमाविहीन जीवन और उनकी सत्ता द्वारा निरन्तर उन्मूलन की कोशिश साफ़-साफ़ नज़र आती है। आधुनिकता के…

रणेंद्र रणेंद्र

स्वस्थ परंपरा के लिए ज़रूरी है कि पूर्व के कार्यों का सन्दर्भ दिया जाए

मेरी बुनियादी मेहनत से दूसरों को हरदेवी संबंधी लेखन में मदद मिल रही है, इससे अधिक एक नया शोधार्थी क्या चाहेगा? लेकिन उसके काम से मदद ली जाए, उसके सहारे…

हम प्राथमिक स्रोतों पर काम करते हैं

यह मानी हुई बात है कि जब शोध के प्राथमिक स्रोत उपलब्ध होते हैं तब द्वितीयक स्रोत का इस्तेमाल नहीं किया जाता। स्रोत सामग्री पर किसी का एकाधिकार नहीं होता,…

सम्पादक का ‘पक्ष’ : चारु सिंह की खोज से संबंधित तथ्य को हमने कहाँ से देखा

सम्पादक लेखक का पक्ष नहीं चुनता, सामने जो प्रकाशन के लिए आयी हुई सामग्री होती है, उसका पक्ष चुनता है। जब तर्क और तथ्य अपनी बात साफ़ बोल रहे थे…

किसी विषय पर किसी का स्वत्वाधिकार नहीं होता

किसी विषय पर किसी का स्वत्वाधिकार नहीं होता—एक ही विषय पर हजारों शोध होते हैं, होते रहे हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे और यह भी सच है कि…

वादे वादे जायते तत्वबोधः—शोध और लेखन के एक नए विषय के रूप में हरदेवी

चारु सिंह ने ‘आलोचना’ अंक-78 में प्रकाशित अपने लंबे शोध आलेख के इस हिस्से में हरदेवी संबंधी अपने काम को बिना श्रेय दिये हथियाए जाने के जो विवरण दिए हैं,…

अभिलेख, आलोचना, इतिहास और हरदेवी का जीवन

अपने शोध के आधार पर चारु सिंह को ही ‘अज्ञात हिन्दू औरत’ की हरदेवी के रूप में पहचान करने और उनके बौद्धिक एवं सामाजिक कार्यों को व्यवस्थित रूप में आलेखबद्ध…

आलोचना अंक-78 पर एक नज़र

इस अंक में ज़्यादातर आलेख जहाँ युवा आलोचकों के हैं, वहीं समीक्षाएँ वरिष्ठ और लब्धप्रतिष्ठ आलोचकों तथा रचनाकारों की लिखी हुई हैं। अंक को अंतिम रूप देते हुए इस विपर्यय…