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मुक्तिबोध कृत ‘एक साहित्यिक की डायरी’ फिक्शन और नॉन-फिक्शन के सरलीकृत द्विभाजन को प्रश्नांकित करती है। कहा जा सकता है कि फिक्श्नलाइज्ड नॉन-फिक्श्न के प्रयोगात्मक हस्तक्षेप से मुक्तिबोध इस डायरी को डायरी के प्रचलित अर्थों से परे ले जाते हैं।