महाश्वेता देवी का आदिवासी संसार : आख्यान, इतिहास और उपन्यास का रचनात्मक खेल

महाश्वेता के आदिवासी कथा-साहित्य में अतीत से वर्तमान तक पसरी गरीबी, बदहाली, बंधुआगिरी, अपराधी-सा गरिमाविहीन जीवन और उनकी सत्ता द्वारा निरन्तर उन्मूलन की कोशिश साफ़-साफ़ नज़र आती है। आधुनिकता के लिखित शब्द-कानून आदिवासियों के लिए हिंसा के स्रोत के रूप में बार-बार रेखांकित होते हैं। महाश्वेता की यह अवधारणा सच साबित हुई है कि जेलखाने, पुलिस थाने, बंधुआगिरी और विकास परियोजनाएँ ये सभी आदिवासियों के पूर्ण उन्मूलन में लगी हैं।

रणेंद्र

महाश्वेता का पारिवारिक परिवेश। व्यक्तित्व में अंतर्निहित पददलित समाज के प्रति संवेदना। किशोरावस्था से ही समाजसेवा का जज़्बा। इन सभी कारकों ने उन्हें आदिवासी समाज से गहराई से जोड़ा। उनका जन्म अविभाजित बंगाल के ढाका जिले के नए भरेगा गांव के एक मध्यवर्गीय परिवार में 14 जनवरी 1926 ईस्वी को हुआ था। वे मनीष घटक एवं धरित्री देवी की प्रथम संतान थीं। इस दम्पत्ति की आठ और संतानें हुईं। पिता मनीष घटक एक कवि और उपन्यासकार थे तो माता भी लेखक के साथ-साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। मनीष घटक ने बांग्ला गल्प-साहित्य की बंकिम चंद्र, शरतचन्द्र और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की स्थापित धारा से अलग हटकर पहली बार सर्वहारा चरित्रों और उनके जीवन को चित्रित किया। उनके कथा-साहित्य में चोर, पॉकेटमार, गंदी बस्ती में रहने वाले लोगों का जीवन पूरी दक्षता और समग्रता से वर्णित हुआ। उनकी रचनाएँ बांग्ला-साहित्य के लिए एक ‘बदलाव-बिन्दु’ साबित हुईं थीं।

महाश्वेता को अपने पारिवारिक परिवेश से गरीबों, पददलितों के प्रति लगाव सहज रूप से प्राप्त हुआ था। 1938 से 44 के बीच में इनका परिवार कोलकाता के बालीगंज, भवानीपुर इलाके के एक अभिजात मोहल्ले में किराए के घर में रहता था किन्तु यह संयोग था या भविष्य का कोई संकेत कि उन्होंने भ्रमवश स्कूल में अपना नाम अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति की सूची में लिखवा दिया।

महाश्वेता के जीवनीकार कृपा शंकर चौबे के अनुसार—

महाश्वेता की पहली बार 1965 में हुई पलामू की यात्रा ने उनकी जीवनचर्या ही बदल दी। उन्होंने प्रत्यक्षत: यह अनुभव किया कि किस तरह आदिवासियों को विभिन्न तरीके से तीव्र रक्त शोषण, दोहन, दमन और उत्पीड़न का शिकार बनाया जा रहा है। उनके हृदय में हाहाकार मच गया। महाश्वेता ने तभी से आदिवासियों को भारतीय समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया। फिर तो आदिवासी इलाके महाश्वेता के लिए तीर्थ बन गए। जिस तरह लोग तीर्थ करने जाते हैं, 1965 के बाद महाश्वेता भी साल में काम से कम दो बार तीर्थ पर (आदिवासी क्षेत्रों में) निकलने लगी। (महाअरण्य की मां, पृष्ठ 34-35)

प्रारंभिक जीवन संघर्ष के क्रम में जब महाश्वेता विश्व साहित्य और भारत के स्वतंत्रता संग्रामियों की जीवनियों का अध्ययन कर रही थीं, उसी समय उनके मन में झाँसी की रानी पर कुछ लिखने का विचार आया। मित्रों की मदद से उन्हें प्रारंभिक अध्ययन सामग्री मिली। कोलकता की नेशनल लाइब्रेरी में भी कुछ संदर्भ पुस्तकें मिलीं। किन्तु वे इससे संतुष्ट नहीं हुईं और वे झाँसी की यात्रा पर निकलीं। 1954 में उन्होंने अकेले बुंदेलखंड के चप्पे-चप्पे को कदमों से नापा। वहाँ के लोकगीतों को कलमबद्ध किया। झाँसी की रानी के वंशज श्री गोविंदराम चिंतामणि ताम्बे के साथ साक्षात्कार किया। वृंदावन लाल वर्मा से भी भेंट की। इस अत्यंत परिश्रम, कठिन शोध के उपरान्त जब 1956 में झांसीर रानी प्रकाशित हुई जिसे बांग्ला साहित्य-समाज ने सम्मान के साथ स्वीकृति दी। इस स्वीकृति ने महाश्वेता में एक आत्मविश्वास पैदा किया। उन्होंने यह महसूस कर लिया कि उन्हें भविष्य में कथाकार ही बनना है।

1957 में उनका दूसरा उपन्यास नटी हुमायूं कबीर द्वारा संपादित ‘चतुरंग’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। ‘नटी’ (1957) के बाद 1977 में अरण्येर अधिकार (जंगल के दावेदार) लिखने के बीच में महाश्वेता भी बंगाल के उच्च-मध्यवर्ग के शौकीन साहित्य-प्रेमियों के लिए शरतचंद्रीय धारा के अनुरूप ही आत्ममुग्ध, प्रेमपूर्ण गल्प लिख रही थीं, यथा: धुरे-मधुर’ (1958), ‘यमुनार तीरे’ (1958), ‘एईटुकु आशा’ (1959), ‘तिमिर लगन’ (1959), ‘तरार आधार’ (1960), ‘रूपरेखा’ (1960) आदि।

अरण्येर अधिकार (जंगल के दावेदार) लिखने के पीछे की कहानी कृपाशंकर चौबे कुछ यूँ वर्णित करते हैं, “1974 में फिल्म निर्माता शांति चौधरी ने महाश्वेता से बिरसा मुण्डा पर कुछ लिखकर देने को कहा। श्री चौधरी, बिरसा पर फ़िल्म बनाना चाहते थे। तो बिरसा पर लिखने के लिए महाश्वेता ने पहले तो कुमार सुरेश सिंह की किताब पढीं। फिर दक्षिण बिहार गईं। वहाँ के लोगों से मिलीं। कई तथ्य संग्रहित किए। फिर लिखा ‘अरण्येर अधिकार’।

1979 में जब उन्हें इस किताब पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों ने जगह-जगह ढाँक बजा-बजाकर गाया था—“हमें साहित्य अकादमी मिला है।” …मुण्डाओं ने महाश्वेता का अभिनंदन करने के लिए उन्हें अपने यहाँ मेदिनीपुर में बुलाया। 1979 की उसी सभा में आदिवासी वक्ताओं ने कहा था—मुख्य धारा ने हमें कभी स्वीकृति नहीं दी। हम इतिहास में नहीं थे। तुम्हारे लिखने से हमें स्वीकृति मिली।(महाअरण्य की मां : पृष्ठ, 44)

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अरण्येर अधिकार’ : धरती आबा से राष्ट्रीय गौरव तक

‘अरण्येर अधिकार’ दरअसल, इतिहास के पन्नों में धरती आबा बिरसा मुण्डा की यात्रा का आगाज भर था। एक लेखनी—एक पुस्तक भारतीय इतिहास, जनमानस और सामाजिक-राजनीतिक परिवेश को किस तरह और कितना प्रभावित कर सकता है, यह कुमार सुरेश सिंह और महाश्वेता देवी के सृजन ने प्रमाणित किया।

कुमार सुरेश सिंह अगस्त 1960 से दिसंबर 1962 तक खूंटी में अनुमंडल अधिकारी थे। इसी क्रम में धरती आबा बिरसा मुण्डा के अनुयायियों (बिरसाइतों) के गीतों को सुनकर शोध के लिए उत्सुक हुए। उन्होंने धरती आबा पर ही पी.एच.डी. हेतु पटना विश्वविद्यालय में निबंधन कराया। बिरसा मुण्डा के अनन्य साथी भरमी मुण्डा द्वारा लिखित एक पांडुलिपि, मोचिराय मुण्डा द्वारा 1951 में प्रकाशित बिरसा भगवान शीर्षक की प्रथम जीवनी, बृहस्पतिवारी बिरसा धर्मावलंबियों के गुरु लालो भगत से प्राप्त पांडुलिपि, बिरसा आंदोलन से संबंधित ढेर सारे लोकगीत आदि ने कुमार सुरेश सिंह के शोध को एक विश्वसनीयता और गहराई प्रदान की। 1967 में उनका शोध ग्रंथ, ‘द डस्ट स्टॉर्म एंड हैंगिंग मिस्ट : ए स्टडी ऑफ़ बिरसा मुण्डा एंड हिज मूवमेंट इन छोटा नागपुर, 18741901 शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस शोध ग्रंथ ने धरती आबा को अकादमिक जगत में, विशेष रूप से भारतीय इतिहास में एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्थापित कर दिया। किन्तु जैसे ही 1977 में लगभग इसी पुस्तक पर आधारित महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ प्रकाशित हुआ, वैसे ही बिरसा मुण्डा अकादमिक जगत से निकलकर पाठकों के हृदय तक पहुँच गए। इस हृदय तक पहुँचने की प्रक्रिया ने देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में ढेर सारे परिवर्तनों को अंजाम दिया।

कुमार सुरेश सिंह के शब्दों में—

दूसरा महत्वपूर्ण रुझान है बिरसा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सभी राजनीतिक पार्टियों एवं सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं के द्वारा विशेषत: 1982 में राउरकेला में स्थापित बिरसा मुण्डा स्टैचू कमेटी द्वारा तीव्र और आक्रमक रूप से प्रचार-प्रसार। इसमें 15 नवंबर, 1989 को बिरसा मुण्डा पर एक डाक टिकट जारी करना, 16 अक्टूबर, 1989 को उनके पोर्ट्रेट का पार्लियामेंट के केंद्रीय हॉल में अनावरण, केंद्रीय कारागार और रांची हवाई अड्डे का बिरसा मुण्डा के नाम पर नामकरण आदि शामिल है। भारत के राष्ट्रपति ने 28 अगस्त, 1998 को पार्लियामेंट हाउस के अहाते में बिरसा मुण्डा की मूर्ति का अनावरण किया और बिरसा राष्ट्रीय नेताओं की श्रेणी में आने वाले पहले आदिवासी नेता बन गए। (बिरसा मुण्डा और उनका आंदोलन : भूमिका, पृष्ठ VIII)

यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। 15 नवंबर, 2000 को धरती आबा के जन्मदिन पर ही केंद्र सरकार ने झारखंड को एक अलग राज्य के रूप में गठन की स्वीकृति दी। वन अधिकार कानून हेतु सन् 2000 से प्रारंभ अखिल भारतीय आंदोलनों में यह देखा गया कि चाहे वह हिमाचल या उत्तराखंड के आदिवासी संगठन हों या केरल, वायनाड जिले के आदिवासी संगठन, सभी आंदोलनकारियों ने बिना किसी बाहरी प्रेरणा या प्रभाव के अपने संगठनों का नाम बिरसा मुण्डा से जोड़ रखा था।

और हाल ही में, 15 नवंबर 2023 को भारत सरकार ने धरती आबा बिरसा मुण्डा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इस प्रकार रांची, खूंटी, बंदगांव, चाईबासा, सिमडेगा के जंगलों, खेतों, सरना स्थलों और रात्रि कालीन अखड़ा नृत्य-गीतों में खोए हुए उस महान क्रांतिकारी बिरसा मुण्डा को राष्ट्रीय गौरव के रूप में स्थापित करने में कुमार सुरेश सिंह और महाश्वेता देवी की लेखनी ने जो भूमिका निभाई है वह अवर्णनीय, अभिनंदनीय और अनुकरणीय है।

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द्रौपदी-दोपदी माँझिन: कहानी के पन्नों से बाहर की यात्रा

धरती आबा की तरह ही महाश्वेता की लेखनी से सृजित एक काल्पनिक क्रांतिकारी-नेत्री ‘द्रौपदी’ ने भी अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ हासिल की। उनकी इस अत्यंत चर्चित कहानी ‘द्रौपदी’ की नायिका दरअसल सबसे पहले अग्निगर्भ उपन्यास में उपस्थित होती है। यहाँ कथाकार ने एक युक्ति का उपयोग किया है जो चरित्र ‘अग्निगर्भ’ में अमर नायक बसाई टुडू के चरित्र के विकास के क्रम में उपेक्षित रह गया था, वह प्रखर, जुझारू दोपदी माँझिन, ‘द्रौपदी’ कहानी में मुख्य चरित्र के रूप में उपस्थित होती है।

द्रौपदी-दोपदी माँझिन एक अपूर्व प्रबल स्त्री, एक विलक्षण एक्टिविस्ट जो खुद निर्णय लेती है, स्वत: स्फूर्तता के साथ संचालित होती है, जिसके तीव्रतम प्रतिरोध में एक सहज लडा़कूपन है। दूसरी ओर, वह एक नारीवादी भंगिमा के साथ भी हमारे समक्ष उपस्थित होती है। इस अपूर्व विलक्षण क्रांतिकारी व्यक्तित्व के लिए महाश्वेता की लेखनी ने एक अद्भुत कहानी ‘द्रौपदी’ रची।

‘अग्निगर्भ’ में काली सांतरा और बसाई टुडू की बातचीत के क्रम में सबसे पहले दोपदी माँझिन से पाठक की भेंट होती है, यथा—

“कोई मिली नहीं?”

“चाहने पर मिल जाती? उस लड़की ने मुझे चाहा ही नहीं। साली जाकर दुलना से ब्याह कर बैठी। बहुत लड़ाकू औरत है।”

“क्यों कमरेट, मेरी बात कह रहे हो?”

थोड़ा भारी हँसी से उछलता गला। काली ने चौंककर पीछे देखा। आकाश और खोयाई नदी की पृष्ठभूमि में जैसे सबकुछ उसका हो, इस तरह रानी की भंगिमा में एक संताल स्त्री खड़ी थी। वयस होगी छब्बीस बरस। बहुत काली, बहुत असभ्य, बहुत सुंदरी।” (अग्निगर्भ : पृष्ठ 59)

पुन: ऑपरेशन जागुला के बाद मारे गए बसाई टुडू की पहचान परेड में दुलन और दोपदी माँझिन दिखते हैं। यहाँ महाश्वेता की लेखनी दोपदी के आदिवासी सौंदर्य का अद्भुत वर्णन करती दिखती है—

बाकुली से एक और बस आई। सबसे आगे उतरकर बढ़ी आ रही है एक आश्चर्यजनक रमणी। वह बहुत ही काली है, जिस तरह संताल औरतें हुआ करती हैं। वह बहुत अद्भुत थी, क्योंकि उसका शरीर बहुत आश्चर्यजनक था। पत्थर-सा गढ़ा। वह बहुत ही आश्चर्यजनक थी, बहुत आश्चर्यजनक, क्योंकि उसका चेहरा अभिव्यक्ति विहीन नहीं था। एक आश्चर्यजनक व्यक्तित्व था। वह स्त्री इस तरह उतरी और बढ़ती गई जैसे वही यहाँ एकमात्र स्त्री हो। एकमात्र पुरुष के पास जा रही हो। वह स्थान जैसे थाने का बरामदा ना हो। काली ने लक्ष्य किया कि औरत के बालों में कोई जंगली फूल है। औरत ने अपने सामने देखा और पीछे हाथ बढ़ाकर एक युवक का हाथ पकड़ा। दोनों हाथ पकड़ बढ़ रहे थे। फिर भी औरत अकेली थी, वह अकेली निर्जन में किसी पुरुष से मिलने आई थी। …एस .पी. बोले, “दोपदी माँझिन। दुलना माझी।” उनका गला सूख गया था। (अग्निगर्भ: पृष्ठ, 100)

‘अग्निगर्भ’ में ही दुलना माँझी और दोपदी माँझिन पुन: प्रकट होते हैं ऑपरेशन बाकुली में जमींदार-महाजन सूर्य साव के वध के लिए। वही सूर्य साव जो पानी के लिए न केवल धान के खेतों को तरसा रहा है बल्कि संताल किसानों को भी। द्रौपदी उसे मारने के लिए इसलिए उत्सुक है कि उसे देखते ही इस जमींदार की आँखों से लार टपकने लगती है। कैप्टन अर्जन सिंह की सैन्य टुकड़ी गोलियों की बारिश करती है और इक्कतीस संताल किसान-मजूर मारे जाते हैं। किन्तु रात में एक जोड़ी लाश गायब हो जाती है। सूर्य साव का भाई रतन साव परेशान है कि आखिर दुलन माँझी और दोपदी माँझिन की लाश कहाँ गई?

महाश्वेता अपनी कहानी ‘द्रौपदी’ में ऑपरेशन बाकुली के आर्किटेक्ट कैप्टन अर्जन सिंह की रात में दो बजे दो लाशों के गायब हो जाने के बाद हुई शारीरिक-मानसिक परेशानी का वर्णन कुछ यूँ करती हैं—

सवेरे लाशों की गिनती करने जाने पर पति-पत्नी को न पाकर, फॉरेन ब्लड शुगर से पीड़ित होकर फिर प्रमाणित हुआ कि बहुमूत्र सचमुच फिकर और घबराहट की बीमारी होती है। बहुमूत्र की बीमारी बारह-भतारी होती है। इसका एक भतार दुश्चिंता है। (अग्निगर्भ, द्रौपदी: पृष्ठ, 149)

…प्रशासन अर्जन सिंह को ही ऑपरेशन फॉरेस्ट झाड़खाली को भेजता है और गुप्तचर दफ़्तर के पास उक्त कलकल करने और नाचने वाले दंपति ही भाग जाने वाली दो लाशे हैं, यह जानकर अर्जन सिंह कुछ देर ‘जोंबी’ हालत को पहुँच जाता है और कृष्णांग लोग उसमें ऐसा अकारण डर पैदा कर देते हैं कि लंगोटी लगाए काले आदमी को देखते ही वह “जान ले ली” कह सन्न होकर जल्दी-जल्दी पेशाब करता और पानी पीता। (अग्निगर्भ, द्रौपदी : पृष्ठ, 150)

गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने ‘द्रौपदी’ कहानी के अपने अनुवाद की भूमिका में इस पात्र की विलक्षणता पर टिप्पणी करती हैं—

प्राचीन काल की द्रौपदी भारतीय महाकाव्य महाभारत की चर्चित नायिका है। आदिवासियों के यहाँ सामान्य तौर पर यह संस्कृतनिष्ठ नाम नहीं पाया जाता। किन्तु यह एक पवित्र-सा नाम द्रौपदी को जन्म के समय उसकी मां की मालकिन, एक शोषक की पत्नी ने उदारता भाव के साथ दिया था। कहानी में आगे चलकर उस शोषक की हत्या द्रौपदी और दुलन ने ही की।

…इस कहानी के अलग-अलग स्तरों के पाठ में यह मायावी और अप्रत्याशित नाम कई खेल दिखाता है। महाभारत की द्रौपदी बहुपतित्व की इकलौती उदाहरण हैं। यह भारत में विवाह संस्था का मान्य रूप नहीं रहा है। वह निर्वीर्य पांडू राजा के पांच पुत्रों के साथ विवाह बंधन में बँधती हैं। पितृसत्तात्मक और कुलगोत्रीय सामाजिक व्यवस्था में द्रौपदी एक अपवाद, विलक्षण और अपूर्वता का बोध हैं। वे अद्वितीय और वैधरूप से बहुलीकृत (बहुतों के लिए) है। ऐसी मां के बच्चों के पिता कौन हैं?, यह ठीक-ठीक निश्चित नहीं किया जा सकता है।

…अपनी कहानी में महाश्वेता द्रौपदी की इस विलक्षणता को प्रश्नांकित करती हैं। वे अपनी दोपदी माँझिन को सबसे पहले तो एक साथी, एक्टिविस्ट और एकल विवाह के प्रति प्रतिबद्ध दिखाती हैं। पति प्रेम में आकण्ठ डूबी दोपदी परिस्थितियों में फँसकर सामूहिक बलात्कार का शिकार होती है।

…महाकाव्य में पाँच पतियों की पत्नी द्रौपदी को उनका एक पति जुए में संपत्ति, एक वस्तु मानते हुए हार जाता है। विजयी राजा का मर्दवादी घमंड पाँच पतियों की पत्नी की वैवाहिक वैधता को अमान्य करते हुए, उसे वैश्या मानता है और भरी सभा में निर्वस्त्र करने में उसे कोई नैतिक बाधा नहीं लगती। मौन भाव से द्रौपदी अवतारी कृष्ण से लज्जा बचाने की प्रार्थना करती हैं। सतत कानून का विचार धर्मशास्त्र यहाँ स्वयं अपने को वस्त्र के रूप में साकार करता है। राजा लगातार साड़ी खींचता जाता है किन्तु साड़ी अंतहीन होती जाती है। असंख्य साड़ियों से बँधी द्रौपदी भरी सभा में नग्न नहीं हो पाती। यह कृष्ण का चमत्कार है।

…महाश्वेता इस प्रसंग का पुनर्लेखन करती हैं। इस कहानी में लोग द्रौपदी को बिना किसी विशेष प्रतिकार के बहुत आसानी से निर्वस्त्र कर देते हैं। यह नग्नता कानून के प्रतिनिधियों द्वारा प्रदत्त एक राजनीतिक दंड की परिणीति भर है। कहानी में आगे सामूहिक बलात्कार के बाद वह स्वयं ही अपने हाथों से कपड़े फाड़ सार्वजनिक रूप से नग्न होती है। बजाय कि उसकी लज्जा किसी दयालु-दैवीय युक्ति से किसी कॉमरेड के हस्तक्षेप से बचाई जाए। कहानी यहाँ इस बात पर बल देती है कि पुरुष नेतृत्व को अब रोक दिया जाए। (महाश्वेता देवी ब्रेस्ट स्टोरीज : ट्रांसलेटर’स प्रीफेस : पृष्ठ 8-11)

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भारतीय परम्परा में निर्वस्त्रता

अपनी ‘द्रौपदी’ कहानी का महाश्वेता जिस प्रकार अंत करती हैं, वह अब तक की भारतीय कथा-परम्परा में अकल्पनीय रहा है। सामूहिक दुराचार के बाद क्षत-विक्षत शरीर, सेनापति पर खून सना थूक फेंकती द्रौपदी भय उत्पन्न करती है। अपने दोनों क्षत-विक्षत स्तनों से जब वह सेनापति को ठेलने लगती है तो वह सेनापति पहली बार नि:शस्त्र टारगेट के सामने खड़े होने से डर गया, बहुत बुरी तरह डर गया।

आखिर निर्वस्त्र स्त्री-शरीर को हथियार बनाने की परिकल्पना महाश्वेता को कहाँ से मिली होगी?

एक तो मुझे लगता है कि बंगाल की शाक्त परम्परा में काली की नग्न और भयोत्पादक छवि की उपस्थिति उक्त अभिप्रेरणा का एक स्रोत रही होगी। इतिहासकार सुमित बनर्जी की माने तो सिंहभूम के आदिवासियों की देवी रंकिणी, बौद्ध धर्म के वज्रयान में पर्णशर्वरी के रूप में पूजित हुईं। आगे की यात्रा में बंगाल के भद्रलोक में माँ काली के रूप में  पूजनीया होने के पूर्व जंगलों में शिकारियों, डाकुओं और ठगों आदि द्वारा ही पूजी जाती रहीं थीं। (सुमित बनर्जी: ‘लॉजिक इन पॉपुलर फॉर्म; द चैन्जिंग रोल ऑफ काली इन द बेंगाली पॉपुलर सायके,  पृ. 33–66)

12वीं सदी  में कर्नाटक की भक्त कवयित्री अक्क महादेवी ने भी पुरुष कामुक दृष्टि के प्रतिकार में ही तो अपने वस्त्र उतार दिए थे। सुभाष राय अपनी पुस्तक ‘दिगम्बर विद्रोहिणी : अक्क महादेवी में इस परिघटना को कुछ यूँ वर्णित करते हैं—

सबसे चौंकाने और तिलमिला देने वाला तथ्य यह है कि अक्क ने सिर्फ़ राजमहल नहीं छोड़ा, वहाँ से निकलते समय पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में अपने वस्त्रों को भी उतार फेंका। यह पूरे संभ्रांत वर्ग की सुरुचि के गाल पर एक तमाचे की तरह था। (स्त्री की स्वयं चुनी हुई नग्नता : पृष्ठ 83)

19वीं सदी में केरल के त्रावणकोर में दलित स्त्रियों को स्तन ढकने के लिए लगने वाले टैक्स के खिलाफ़ तीन विद्रोह दर्ज किए गए हैं। पहला 1822 से 1823, दूसरा 1827 से 1829 और तीसरा आंदोलन 1858 से 1859 तक चला था। दलित नायिका नांगेली ने स्तन ढकने के टैक्स के प्रतिकार स्वरूप वसूलने वाले को केले के हरे पत्ते पर अपना स्तन ही काटकर प्रस्तुत कर दिया था।

महाश्वेता ने अपनी कहानी द्रौपदी में नग्न स्त्री-देह को हथियार और प्रतिकार के रूप में प्रस्तुत करने की प्रेरणा काली, अक्क महादेवी या नांगेली जहाँ से भी ली हों किन्तु मणिपुर के रंगकर्मी-निर्देशक ओजा हेस्नाम कन्हाई लाल ने इस कहानी के नाट्य-रूपांतरण की कई-कई प्रस्तुतियाँ कीं। कन्हाई लाल की पत्नी सावित्री देवी स्वयं द्रौपदी की भूमिका निभाती थीं। नाटक के अंत में प्रतिकार स्वरूप अपने क्षत-विक्षत शरीर को ढके गए कपड़ों से मुक्त करती दोपदी माँझिन के रूप में सावित्री देवी ने भी मंच पर अपने को निर्वस्त्र करने का साहस दिखाया और हर बार दर्शकों को शॉक्ड करती हुई, उनके मर्म को, चेतना को झकझोर कर रख दिया।

इस नाटक को देखने के बाद स्वयं दर्शक भी घायल देह को हथियार में ढालने की मानसिक प्रक्रिया से गुजरता रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि 2004 में एक युवती मनोरमा थंगज्म के अपहरण और बलात्कार के बाद हुई हत्या के खिलाफ़ मणिपुर की माताओं ने 15 जुलाई 2004 को असम राइफल्स के मुख्यालय के समक्ष नग्न प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन ने न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी सशस्त्र बलों की संस्थाबद्ध हिंसा और आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर ऐक्ट जैसे निरंकुश कानूनों के खिलाफ़ अवाम को सोचने के लिए मजबूर किया।

गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने इस कहानी का अनुवाद करके पूरी दुनिया को महाश्वेता देवी की लेखनी की ताकत से परिचय करवाया। इस प्रकार वे महाश्वेता की रचनाओं के लिए मानो वैश्विक जगत की द्वारपाल बन गईं।

अनुवाद की भूमिका में गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक यह अनुमान लगाती हैं कि हो सकता है ‘दोपदी’ ही मूल नाम हो और वह बाद में ‘द्रौपदी’ के रूप में संस्कृत में शामिल हुआ हो। वैसे भी महाभारत के आख्यान में द्रौपदी और धृष्टद्युम्न दोनों भाई-बहन राजा द्रौपद के प्राकृतिक संतान नहीं है बल्कि राजा ने एक यज्ञ के उपरांत उन्हें पाया था। यज्ञ में संतानों को पाना और द्रौपदी के कृष्ण वर्ण का होना कई संकेत देता है। हो सकता है कृष्णा (द्रौपदी) गौर वर्ण के कथित आर्य समुदाय के बाहर से गोद ली गई हों। ‘द्रौपदी’ नहीं ‘दोपदी’ की तलाश में दक्षिण भारत के सांस्कृतिक इतिहास को खंगालने के क्रम ‘द्रौपदी अम्मा की धार्मिक धारा’ से भेंट होती है।

प्रो. अल्फ हिल्तेबेतल (Alf Hiltebeitel), रिलिजन और ह्यूमन साइंस विभाग, जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय, अमेरिका में प्राध्यापक हैं। उन्होंने तमिलनाडु के ‘द्रौपदी कल्ट/धार्मिक धारा’ पर ही अपनी पी.एच.डी. का शोध-प्रबन्ध लिखा है जो तीन खंडों में प्रकाशित है। प्रो. हिल्तेबेतल के अनुसार—

उत्तरी तमिलनाडु के गांवों में थिग्गल, वन्नियार एवं कई अन्य समुदायों में ‘द्रौपदी अम्मा’ शक्ति-पुत्री के रूप में ग्राम देवी और कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। अकेले तमिलनाडु में द्रौपदी अम्मा के चार सौ से ज्यादा मंदिर हैं।

पल्लव वंश के राज काल (400-600 ई.) में तमिल काव्य ‘शिलप्पदिकारम’ दक्षिण अर्काट जिलों में लोकप्रिय हुआ, उसके साथ-साथ ही द्रौपदी अम्मा की भक्ति-धारा का भी विकास हुआ। गिन्गी राज (दक्षिण अर्काट, विल्लुपुरम जिला) की रक्षा से इस भक्ति धारा को लोकप्रियता मिली और यह भक्ति धारा तमिलनाडु से होती हुई आंध्र-कर्नाटक तक पहुँच गई। इन तीनों राज्यों में द्रौपदी अम्मा के आठ सौ से ज्यादा मंदिर हैं। अब तो श्रीलंका, सिंगापुर, मलेशिया, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका में भी द्रौपदी अम्मा के मंदिर देखे जा सकते हैं। कर्नाटक का करेगा त्योहार जो नौ दिनों तक मनाया जाता है वह भी शक्ति अवतार द्रौपदी अम्मा को ही समर्पित है। (द कल्ट ऑफ द्रौपदी : मयथोलॉजिज-फ्रॉम गिनजी टू कुरुक्षेत्र)

महाश्वेता देवी को ‘द्रौपदी अम्मा भक्ति धारा’ की लोकप्रियता की जानकारी थी या ना थी किन्तु महाभारत की नायिका द्रौपदी का विलोम रचती हुई एक संताल नायिका दोपदी माँझिन को उन्होंने भी एक विलक्षण ऐतिहासिकता प्रदान की जो कन्हैया लाल के नाटक की प्रस्तुतियों से कहानी के पन्नों से बाहर निकल आंदोलन की परचम बन गई। यह एक रचना की अद्भुत विकास यात्रा है जो लेखनी की ताकत को गहराई से रेखांकित करती है। यह उन लोगों के लिए एक सबक भी है जो कहते रहते हैं कि लिखने-पढ़ने से क्या होता है।

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बसाई टुडू और चोट्टि मुण्डा : आख्यान को मिथक, मिथक को इतिहास में बदलने की वाचिक परम्परा

‘अग्निगर्भ’ में बसाई टुड्डू की अमरता और ‘चोट्टि मुण्डा और उसका तीर’ में तीर के जादुई होने का आख्यान और मिथक गढ़ती महाश्वेता फिर उसे वाचिक परम्परा के गीत-गान जैसे माध्यम का इस्तेमाल कर मौखिक इतिहास में ढालती नज़र आती हैं। आख़िर वे ऐसा क्यों करना चाह रही हैं? इस यक्ष-प्रश्न के उत्तर खोजने की जरूरत तो है।

आखिर महाश्वेता देवी को ‘अग्निगर्भ’ उपन्यासिका के केंद्रीय चरित्र बसाई टुडू को अमर बनाने की अभिप्रेरणा कहाँ से मिली होगी? क्या वे भारतीय महाकाव्यों के हनुमान और अश्वत्थामा जैसे पात्रों की अमरता के मिथक से प्रेरणा ले रही थीं? किन्तु इनकी अमरता एक दैवीय आभा लिए हुए है, कोई रणनीतिक युक्ति के तहत नहीं गढ़ी गई है।

किन्तु 1910 ईस्वी में बस्तर में हुई क्रान्ति, ‘भूमकाल’ के नायक कोया धुर जिसे अंग्रेजी हुकूमत ‘गुंडा धुर’ कह रही थी, वे भी बसाई टूडू की तरह एक रहस्यमय नायक थे, क्योंकि हर बार गुंडा धुर की गिरफ्तारी के बाद हुकूमत को यह पता लगता है कि किसी दूसरे गांव में कोया धुर अभी भी सक्रिय है। अन्त तक ब्रिटिश हुकूमत को पता नहीं लग सका कि आख़िर कोया धुर है कौन? यह आदिवासियों की सामूहिक नेतृत्व की ताकत है, जिसका अनुमान हुकूमतें नहीं लगा पाती हैं। उनकी व्यक्तिवादी सोच आदतन हमेशा किसी एक व्यक्ति को नायक या नेतृत्वकर्ता मान उसे खत्म करना चाहती ताकि क्रांति-ज्वालाएँ बुझ जाएँ किन्तु ऐसा हो नहीं पाता।

अपने उपन्यास ‘चोट्टि मुण्डा और उसका तीर’ में पृष्ठ संख्या 55 पर महाश्वेता विशाखापट्टनम के पास पहाड़ी और जंगली इलाका, रंपा में सक्रिय क्रांतिकारी अल्लारु सीताराम राजू का उल्लेख करती हैं। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ उनके अभियान और उनकी शहादत को याद करती हैं तो बस्तर के कोया धुर यानी गुंडा धुर के अभियान से कैसे अपरिचित  होंगी? ब्रिटिश हुकूमत दोनों से ही त्रस्त थी और गुंडा धुर और रम्पा फितूर दोनों का एक साथ ही उल्लेख कर रही थी।

महाश्वेता अपने आदिवासी आख्यानों में जिस प्रकार कथा-कहन की वाचिक परम्परा का अनुकरण करती हैं, आख्यान को मिथक और मौखिक इतिहास में परिवर्तित करना चाहती हैं, जमींदारी जैसी परम्परागत शोषक-संस्था का आधुनिक संस्थाओं यथा कार्यपालिका-विधायिका के साथ गठजोड़ दिखाने को बार-बार रेखांकित करती हैं, …उनके इन सारे रेखांकनों को समझने के लिए उनकी ही कुछ अवधारणाओं से गुजरना होगा।

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वाचिकता बनाम लिखित पाठ और आदिवासियत बनाम प्रदूषित आधुनिकता

महाश्वेता अपने आलेखों की पुस्तक ‘डस्ट ऑन द रोड’ और कहानी-संग्रह ‘बिटर सॉइल’ (Bitter Soil) में आदिवासी कथा परिवेश, वाचिकता की ताकत, मौखिक शब्दों-कथाओं की दीर्घजीविता के लिए जादू और चमत्कार के सहारा  लेने की परम्परा, मुद्रित शब्दों और कानून के माध्यम से आदिवासियों के लिए आधुनिकता की सतत हिंसा आदि को व्याख्यायित करती हैं।

महाश्वेता की उपर्युक्त उल्लखित पुस्तकों के आधार पर ही शिव विश्वनाथन अपने आलेख लिसनिंग टू द टेरोडॉक्टिल में उनकी आदिवासी-वाचिकता सम्बन्धी कतिपय अवधारणाओं को रेखांकित करते हैं—

महाश्वेता का मानना है कि केवल आदिवासी ही प्रकृति में सन्निहित नहीं हैं बल्कि प्रकृति भी उनके आत्म (सेल्फ़) का विस्तार है, एक हिस्सा है। आदिवासी कथालोक के पर्यावरण में समाहित हैं, उनके यहाँ हर चीज़ कहानी से शुरू होती है और कहानी पर ही खत्म होती है। अगर कोई कहानी कहना भूल जाता है तो वह एक तरह से घर-वार विहीन हो जाता है। जैसे ही कोई कहता है कि ‘एक बार की बात है’ वैसे ही एक नई दुनिया जन्म लेती है मुक्त और बार-बार नई होती दुनिया। कहानी सदा कानाफूसियों, गप्पों और यादों से स्वयं ही जन्म लेती है और फलती-फूलती रहती है।

प्रारंभ में कहानी थी और शब्द थे। लेकिन कहानी और शब्द मौखिक थे, वे लेखन और मुद्रण के अति उत्पादन के क़ैदी नहीं थे। इन्हीं मौखिक शब्दों से जादू फलता-फूलता था और इन मौखिक शब्दों को भी जीवित रहने और लंबी उम्र के लिए जादू और चमत्कारों की जरूरत थी।

आधुनिकता ने मौखिक शब्दों के लिए चुनौतियाँ खड़ी की। आधुनिकता से जन्म लेने वाला उपन्यास वैयक्तिक था। जैसे ही कहानियों का वैयक्तिकरण हुआ, समुदाय कहीं खो गया। मुद्रित पाठ ने शब्दों का निजीकरण कर दिया जिसे एकांत में भुनभुनाया जा सकता था जबकि मौखिक शब्दों का वाचन समुदाय की उपस्थिति में ही संभव था।

महाश्वेता मुद्रित पाठ से आदिवासी लोकवृत्त में दो तरह की क्षति को देख रही हैं। पाठकों के बड़े समाज में एक उपन्यासकार एक समुदाय से कैसे बातचीत कर सकता है और मौखिक शब्द के जादू को कैसे बचाकर रख सकता है? पाठक मात्र प्रेक्षक या दर्शक है। एक दृश्यरति का शिकार लेकिन वाचिक शब्द हमेशा समुदाय का पुनर्विष्कार  करते हैं। कहानी कहने के क्रम में कभी भी दुहराव नहीं होता। यह मशीनी दुहराव और क्लिशे मुद्रण के साथ आता है। आदिवासी समुदायों से जुड़ाव रखने वाले लेखक को शब्दों की बहुस्वरता-बहुध्वन्यात्मकता को बचाकर रखना चाहिए और इन शब्दों से गुजरते हुए उनका नवीकरण करते रहना चाहिए।

महाश्वेता का मानना है कि लिखित शब्दों की महत्ता वाचिकता पर स्थापित करने से भ्रष्टाचार का जन्म हुआ जो आदिवासी समाजों के लिए शाश्वत हिंसा का स्रोत लेकर आया। एक आदिवासी व्यक्ति के लिए उसकी बोली, उसके वचन एक बंधन, एक दायित्व थे कि उसने जो कहा है उसे वह निभाएगा ही। लेकिन जैसे ही वह लिखित शब्दों से बँधा, वे लिखित शब्द उसके लिए बंधुआगिरी लेकर आए।

एक आदिवासी जमींदार या महाजन के पास एक बोरी अनाज लेने जाता है तो उसके वचन या शब्द उसे अनाज के बदले पर्याप्त नहीं होते। किन्तु जैसे ही उनके खाता-खतियान में लिखे शब्दों पर ठेपा लगता है, वह पीढ़ियों तक उनका बंधुआ बनकर रह जाता है।

एक शब्द या वचन एक बंधन या दायित्व के रूप में जैसे ही अनुबंध पत्र के लिखित शब्दों द्वारा विस्थापित होता है वैसे ही कानून के रूप में एक हिंसा का जन्म होता है। यह आधुनिकता कानूनी तौर पर आदिवासियों को गुलाम बनाकर छोड़ देती है।

…जब प्रकृति मुनाफ़े का साधन बन गई और मौखिक शब्दों ने अपनी ताकत खो दी तब आधुनिकता का जन्म हुआ। जैसे ही प्रकृति और वाचिकता का बधियाकरण किया गया, कहानियों की दुनिया मर गई।

…जब कहानी मरती हैं तो इतिहास का जन्म होता है। वही इतिहास जो हिंसा का आख्यान है, विवरण है। उस हिंसा का जिसका उद्घाटन पुलिस थानों में होता है। आदिवासियों की आधुनिकता से पहले भेंट पुलिस थाने में होती है। वही थाना जो नरक की एक मिनिएचर पेंटिंग (लघु चित्रकारी) है।

ब्रिटिश कानून ने अपनी सुविधा के लिए आदिवासियों को एक ‘अन्य’ (Other) और स्वयंसिद्ध रूप में अपराधी मान लिया। अब चूँकि सारे आदिवासी अपराधी हैं तो उन्हें विस्थापित किया जा सकता है, इस्तेमाल कर फेंका जा सकता है और जो अनावश्यक है, जिनकी जरूरत ही नहीं है। आदिवासियों का अपराधीकरण और बंधुआ मजदूरी का अविष्कार ब्रिटिश कानून की दो बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं।

महाश्वेता का यह भी मानना है कि आधुनिकता तार्किकता के माध्यम से संदर्भों के अनुरूप हमेशा विकृत (Pervert) होती रहती है। उनके अनुसार ‘परम्परा की आधुनिकता’ (मॉडर्निटी ऑफ़ ट्रेडीशन) भी हिंसा की जनक है। परम्परा की आधुनिकता यह दर्शाती है कि इन दोनों व्यवस्थाओं की बुराइयाँ कैसे हाइब्रिड हो सकती है। जमींदार अपने हित में कानून को उलट सकता है या अपने पक्ष में घुमा सकता है।

यह परम्परा की आधुनिकता ही है जो भारत में दोनों चीज़ें रचती है, एक तो चेतना या जागरूकता का आनंद और दूसरा चुपचाप बुरी शक्तियों को मजबूत करना। आधुनिक निरंकुशता और पितृसत्ता आराम से जुड़कर आधुनिकता को दुचित्तापन  प्रदान करती हैं जिसके तहत या तो अपना सिर बचाइए या अपना हृदय।

…गुंडे और जमींदारों के लिए दोनों व्यवस्थाएँ जुड़वा हैं, वे आधुनिक अर्थों में लोकतंत्र को जमींदारी से ही एकीकृत कर देते हैं। उनके लिए लोकतंत्र जमींदारी का ही एक विस्तृत रूप है, विस्तार है। दूसरी ओर आधुनिकता प्रतिकार का एक दुर्बल स्रोत है। पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, मध्यवर्गीय क्रांतिकारी, विदेश में बसे प्रवासी अर्थशास्त्री सभी की मंशा  अच्छी है और ये सभी अपने कामों में प्रवीण है किन्तु ये सभी भारत में आधुनिकता के उच्श्रृंखल स्वभाव को समझने में असफल रहे हैं।

एक प्रदूषित आधुनिकता जो जमींदारी के ही नैरंतर्य के रूप में लोकतंत्र से प्रारंभ होती है और विकास के रूप में अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है। वही विकास जो आदिवासियों को हर हाल में मिटाना चाहता है। …जेलखाना, पुलिस स्टेशन, बंधुआ मजदूरी और विकास परियोजनाएँ ये चार माध्यम हैं, जिनके द्वारा आदिवासियों का पूर्ण उन्मूलन होना है। महाश्वेता इसकी साक्षी बनती हैं। (इंडिजेनेटी : कल्चर एण्ड रेप्रिज़ेन्टेशन, लिसनिंग टू द टेरोडैकिटल : पृष्ठ 7-9)

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 ऑपरेशन बसाई टुडू

महाश्वेता देवी के कथा-संग्रह ‘अग्निगर्भ’ की मुख्य उपन्यासिका ‘ऑपरेशन बसाई टुडू’ के अंग्रेजी अनुवादक सामिक बंद्योपाध्याय ने अपनी सुविस्तृत भूमिका में बसाई और काली सांतरा के माध्यम से ग्राम्य-बांग्ला की कृषि अर्थव्यवस्था की परतों में अंतर्निहित शोषण और दोहन के उपकरणों और इस संरचनात्मक हिंसा से पीढ़ियों से पिस रहे भूमिहीन कृषि मजदूरों के संघर्ष को समझने और समझाने की कोशिश की है।

सामिक बंद्योपाध्याय के अनुसार—

‘1084 वें की माँ’ में जैसे ही महाश्वेता देवी नए इलाकों के रहस्य को खोलती हैं, वैसे ही वे स्वयं भी शहरी घरेलू  मध्यवर्ग की सीमा से निकलकर युगों-युगों से शोषित आदिवासियों और भूमिहीन किसानों के बृहत्तर वृत्त में पहुँच जाती हैं।

‘1084 वें की माँ’ की नेरेटर सुजाता की तरह ही महाश्वेता उक्त क्रांति की जड़ों की तलाश करती हैं। लेकिन वे जड़ों को गहरी भूमि में तब तक खोजती हैं, जब तक भूमि समस्या की तह तक नहीं पहुँच जाती। जिनके कारण 1967 में नक्सलबाड़ी और उसके आसपास के गांव में क्रांति फूट पड़ी थी।

इस आंदोलन को शहर के बौद्धिक वर्ग का भी व्यापक समर्थन मिला, वे इसे अपने प्रायश्चित के प्रतीक के रूप में देख रहे थे। उन्होंने मौन भाव से स्वीकार कर लिया था कि यह जो शाश्वत शोषण की व्यवस्था है, उससे वे पीढ़ियों से लाभान्वित होते रहे हैं।

दरअसल शहरों के युवा गुरिल्ला उसी भद्रलोक के वंशज थे जिन्होंने 1793 की स्थाई बंदोबस्ती के बाद जब कुप्रबंधन के कारण बड़ी जमींदारियाँ टूटी और उनका उप-सामंतीकरण हुआ तो सर्वाधिक लाभ उठाया था। इतिहासकार पार्थ चटर्जी के अनुसार, ‘कृषि अर्थव्यवस्था में 1860 के बाद जमीन के मालिक और लगान वसूली करनेवाले बिचौलियों  का एक विशाल वर्ग खड़ा हुआ जो 1918-19 में लगान वसूली का 76.7% हिस्सा हड़पकर जा रहा था। 1918-19 में पूरे बंगाल में कुल 12.85 करोड रुपए की लगान वसूली हुई जिसमें मात्र 2.99 करोड़ रुपए ही राजस्व के रूप में सरकारी खजाने में जमा हुए। इस लगान वसूली और राजस्व के जमा होने के बीच के अंतराल से ही बंगाली मध्यवर्ग या भद्रलोक का जन्म हुआ था।

यह भद्रलोक जो पूरी तरह परजीवी था, जिसकी केवल लगान वसूली में अभिरुचि थी, जिसने किसी तरह के सृजन-उत्पादन में कोई निवेश नहीं किया। न्यायपालिका, प्रशासन, शैक्षणिक संस्थानों में भी इसी वर्ग के लोग थे। दरअसल अंग्रेजी भाषा की शिक्षा सारी प्रथम श्रेणी की नौकरियों, अन्य प्रोफेशन के लिए एक अनिवार्य शर्त थी, इसलिए सारी सेवाएँ भी इसी भद्र लोक के पहुँच में थी। सांस्कृतिक-परिदृश्य में भी यही वर्ग छाया हुआ था, जिसका सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया से दूर-दूर का संबंध नहीं था। (पार्थ चटर्जी, बंगाल 1930-47, द लैंड क्वेश्चन, कोलकाता, 1984, पृष्ठ 11-13) 

 

…व्यावहारिक अर्थों में बंगाली भद्रलोक-शिक्षित शहरी मध्यवर्ग ही ‘जोतदारों’ की धुरी था, एक शब्द जिसके अंतर्गत लगानभोगी-परजीवी बिचौलियों का विशाल स्पेक्ट्रम था, जिन्हें खुद खेती करने से कोई नाता नहीं था।

चालीस के दशक के पूर्वार्द्ध तक यही स्थिति बनी रही, जब कुछ व्यापारियों और कुछ मूल जोतदारों या उनके वंशजों ने बंगाल के कुछ दूरस्थ हिस्सों में उन्हें हटाकर जगह नहीं बना ली। किन्तु के सारे ‘जोतदार’ बरगादारों या बटाईदारों  के भरोसे ही खेती करते थे। वे ही बरगादारों को बीज, हल, बैल, खुराकी और थोड़ी बहुत मजदूरी देने के बदले, आधा से ज्यादा फसलों पर दावा करते आ रहे थे।

1946-47 के तेभागा आंदोलन ने तस्वीर थोड़ी बदली जब बरगादारों ने फसल की एक तिहाई (तेभागा) की माँग की। साथ ही काटने के बाद फसल जोतदार/जमींदार के दरवाजे पर नहीं बल्कि किसान के खलिहान में ले जाने की माँग भी शामिल थी।

बरगादार या बटाईदार किसानों के गुस्सा फूट पड़ने का कारण यह था कि जमींदार न केवल जमीन मालिक था बल्कि गांव में महाजनी का धंधा भी वही करता था।  भूख-अकाल से लेकर किसान के घर के हर काज, शादी-विवाह, हारी-बीमारी में कर्ज लेने को मजबूर करता और चक्रवृद्धि ब्याज के कारण सात पीढ़ियों तक वह सूद और मूल कभी खत्म नहीं होते। किसान बंधुआ मजदूर बनकर रह जाता था। 1947 में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तान्तरण से कांग्रेस का शासन आया जिससे जोतदारों का मनोबल और बढ़ गया।

बाद में जब वाम दलों की सरकार आई तो बरगादारों को थोड़ी राहत मिली। किन्तु इस उपन्यासिका में महाश्वेता ने  कृषि अर्थव्यवस्था के एक अन्य अंतहीन शोषण के शिकार वर्ग को सामने लाती हैं, वह है—भूमिहीन कृषि मजदूरों का वर्ग।

इस वर्ग का बहुलांश आदिवासी समुदायों का था जो पूर्णतया जोतदारों की दया पर आश्रित, पराधीन जीवन युगों-युगों  से जीते आ रहे थे। जिनके हक-हकूक की लड़ाई की जिम्मेदारी अभी तक किसी संगठन ने नहीं ली थी। जो निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का लाभ भी उठाने से वंचित थे।भूमिहीन खेतिहर मजूरों की ‘न्यूनतम मजदूरी’ का दहकता सवाल और बसाई की उसे हर हाल में हासिल करने की जिद ही इस रचना की धुरी है।

नक्सल आंदोलन के वास्तविक आदिवासी नायकों को छोड़कर महाश्वेता ने एक अपना आदिवासी नायक बसाई टुडू को गढा जो नक्सली आंदोलन और संसदीय राजनीति दोनों से दूरी बनाकर चलता है। जो दृढ़ता से खेतिहर मजदूरों की लड़ाई लड़ता है। उन्होंने अपनी लेखनी से बसाई टुडू के रूप में एक मिथकीय नायक को रचा है जो अपने एक्शन के दौरान पुलिस एनकाउंटर में मारा जाता है। किन्तु कुछ ही समय बाद पुन: जीवित हो उठता है और किसी दूसरे जमींदार के खिलाफ़ एक्शन करता दिखाई पड़ता है।

बसाई टुडू के मिथ का जादू पूरे आख्यान को गतिमान बनाए रहता है और पूरी कथा को एक जुड़ाव और एकत्व की ओर ले जाता है। केवल पंक्तियों के बीच में पढ़ने पर पाठक को इस क्रांतिकारी परियोजना की समझ स्पष्ट हो पाती है जिसमें नेतृत्वकर्ता एक रणनीति के तहत बसाई टुडू की पहचान (हवा में गर्दन मरोड़ने वाली हस्त मुद्राओं) के साथ शहीद होता रहता है।

साथ ही, बसाई टुडू के नाम से अंदरूनी तौर पर पुलिस महकमे में भी एक खौफ़ है कि जिन सब-इंस्पेक्टरों ने ऑपरेशनों में उसके खिलाफ़ कार्रवाई की है, उनके साथ कुछ ना कुछ अघटित घटा है।

इस लड़ाई के एक छोर पर बसाई टुड्डू और उसके कृषि मजदूर साथी है तो दूसरे छोर पर जोतदार, जो जमींदार भी है और महाजन भी। बीच में काली सांतरा, एक निम्न मध्यवर्गीय कम्युनिस्ट पत्रकार, प्रेक्षक की भांति खड़ा है, असहाय-सा। यह काली सांतरा महाश्वेता के उपन्यासों  के उन संवेदनशील पाठकों की तरह है जो ‘शोषण के इतिहास की’ उस धारा से सुपरिचित हैं, जो अभी तक अटूट है, जरा-सी कमजोरी नहीं पड़ी है। किन्तु वह अपनी असमर्थता और संसदीय राजनीति के वामदलों की भी असहायता को महसूस कर रहा है और यथास्थिति बनाए रखने के सत्ता के हथकंडों को देख-देख कर गहरी उलझन में पड़ा हुआ है।

बसाई का लडा़कूपन जिसने अपने को सुचिन्तित तौर पर वामदलों के संगठित कार्यक्रमों से बाहर रखा है और काली  सांतरा की लाचारी जो संगठित वामदल का कार्यकर्ता है विशेष रूप से रेखांकित करने योग्य है। इन दो छोरों के बीच   के विविध अनुभवों का बहुत ही गहराई के साथ एक चाक्षुष-सा वर्णन महाश्वेता हमारे सामने रखती हैं।

अंतत: बसाई के अभियान उसके नायकत्व को स्थापित करने के लिए वर्णित नहीं हुए हैं बल्कि बेचैन करने वाले असंख्य प्रश्नों के नैरेटिव के साथ हमारे समक्ष खड़े होते हैं और काली सांतरा के साथ-साथ सारे मध्यवर्गीय पाठकों को उनकी लाचारी से रू-ब-रू करवाते हैं ताकि वह अपनी बेबसी से उपजे अपराध बोध और शर्म को महसूस कर सकें।

हर बार मृतक बसाई टुडू की पहचान के लिए काली सांतरा की जरूरत होती है। बसाई की एनकाउंटर में मृत्यु और उसकी पहचान की रूटीन प्रक्रिया का एक कार्य में बदलना एक कथात्मक उपकरण के रूप में हर बार नया लगने वाले दो अनुभवों के बीच खुलता है। एक स्तर पर यह पहचान प्रशासन द्वारा लेफ्ट पार्टी के सहयोग या सह- अपराधिता के साथ उसकी की मृत्यु के प्रति सुनिश्चित होना है। तो दूसरे स्तर पर वामदल का प्रतिनिधि काली सांतरा प्रशासन को हर बार धोखा दे रहा है। एक तरह से अप्रत्यक्षत: वह बसाई की ‘न मरने वाली’ मिथ की रणनीति में सहयोग कर रहा है।

‘मृतक-पहचान’ के ये दो पक्ष प्रतीकात्मक रूप में दक्षिणपंथी व्यवस्था द्वारा परिभाषित और नियंत्रित राजनीतिक परिदृश्य में वाम दल के सहयोग को भी दर्शाते हैं। काली सांतरा की बेबसी-लाचारी दरअसल संगठित लेफ्ट पार्टी की दुविधा और वाक्छल यानी सच छुपाने की कोशिश है जो दक्षिणपंथी व्यवस्था में अपना प्राधिकार और शक्ति को मजबूत करना चाहता है, इस दूर की आशा के साथ कि एक दिन भीतर से ही इसे गिरा देंगे। (बसाई टुडू, भूमिका : पृष्ठ X-XV)

बसाई टुडू  और काली सांतरा के बीच हुई बातचीत के क्रम में महाश्वेता न केवल भूमिहीन कृषि मजदूरों की अनंत दुखों और पीड़ाओं का बयान करती हैं। उसके साथ-साथ संसदीय राजनीति में फँसे वाम दलों की विवशता को भी बार-बार चिन्हांकित करती हैं कि किस तरह चुनाव की मजबूरी ने उन्हें जमींदारों-महाजनों के साथ खड़ा कर दिया। जिनके खिलाफ़ कभी किसान-सभा संघर्ष किया करती थी। बातचीत के क्रम में बसाई इस बात पर बल देता है कि वह नक्सली नहीं है किन्तु भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की लड़ाई में अगर नक्सली मदद देना चाहे तो वह उसे अपनी शर्तों पर स्वीकार करेगा। दोपदी माँझिन नक्सल आंदोलन से जुड़ी हैं जिसका नेतृत्व शहरी गुरिल्लों के हाथों में है। दोपदी और दुलन सीधे बसाई टुडू के आंदोलन के साथ नहीं जुड़े हैं फिर भी उसके सहयोगी के रूप में बार-बार उपस्थित होते हैं।  इस प्रकार महाश्वेता यह समझाना चाहती हैं कि ये आंदोलन आपस में जुड़ने, ओवरलैप करने के लिए बाध्य हैं।

महाश्वेता बसाई टुडू के एक्शन और उसके खिलाफ़ विभिन्न ऑपरेशन का इतना जीवंत और चित्रात्मक वर्णन करती हैं कि लगता है सारी घटनाएँ आँखों के सामने घट रहीं हैं। जमींदार प्रताप आढ़तिया के खिलाफ़ 1970 का ऑपरेशन-बनारी, जमींदार रामेश्वर भुईयाँ के खिलाफ़ 1972 का ऑपरेशन-जागुला और जमींदार सूर्य साव के खिलाफ़ 1973 का ऑपरेशन-बाकुली जिसमें कप्तान अर्जन सिंह की सैन्य-टुकड़ी इक्कतीस लाशें बिछा देती है और अंत में 1976 का ऑपरेशन कदमकुआं जो जमींदार जगतारण लोहरी और जमींदार पतितपावन लोहरी के खिलाफ़ हुआ था। काली सांतरा के साथ-साथ पाठकों को भी मालूम है, महाश्वेता ने अपने संकेतों से स्पष्ट किया है कि ऑपरेशन-बाकुली में बसाई के अभिन्न साथी मुसाई टुडू ने शहादत दी थी और ऑपरेशन कदमकुआं में पैर में गोली लगने से गैंग्रीन से मृतक  दुलन माँझी है। किन्तु काले रंग, 5 फुट 6 इंच की लंबाई, सिर पर चोट के निशान और गुस्से में हवा में गरदन मरोड़ने की क्रिया सारे साथी अपनी शहादत के पूर्व यह अभिनय दोहराते हैं ताकि बसाई टुडू की अमरता का मिथ एक रणनीति के तौर पर कभी खत्म ना हो।

इस उपन्यास में महाश्वेता देवी के लेखनी की दो विलक्षणताएँ मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत प्रभावित करती हैं। एक तो बसाई का ‘भौंरी’ भैंस के साथ आंतरिक लगाव। इस लगाव को महाश्वेता जैसी स्त्री रचनाकार ही महसूस कर सकती थी, किसी पुरुष कथाकार के बस की बात यह नहीं थी।

महाश्वेता के शब्दों में—

काली जानता है कि बसाई चलते-चलते गौरैया के बच्चे को गिरा देखकर घोंसले में रख देता। प्यार! पहली बार बसाई एक भैंस के लिए बनारी में मरा था। भैंस का नाम था भौंरी। (अग्निगर्भ, पृष्ठ 67)

…ऑपरेशन बनारी  में एक्शन के बाद जमींदार प्रताप अढ़तिया और उसके बंदूकधारी महेंदर की लाशें नाव के बदले भौंरी की पीठ पर लादकर नदी पार की गई और चार मील दूर एक गहरी दलदल में डाल दिया गया। किन्तु बसाई ने भौंरी को यूँ ही नहीं छोड़ दिया। उसे वापस उसके घर पहुँचाने के लिए फिर नदी में उतरा।

महाश्वेता यहाँ आदिवासी संताल बसाई टुडू और एक पशु भौंरी के बीच एक अपूर्व स्नेह-संबंध को रेखांकित करती हैं। उन्हीं के शब्दों में—

चल भाई, कमरेट! कह कर बसाई ने भौंरी की पीठ पर थाप लगाई। भौंरी ने इन कुछ दिनों से बसाई के साथ बड़ी दोस्ती से अभ्यास किया था। स्त्री-स्वभाववश उसने बसाई की ओर सिर बढ़ा दिया। बसाई ने उसका गला खुजला दिया। मौन दोस्ती थी। पूँछ से भौंरी मच्छर भगा सके, इसलिए जंगल में भौंरी के बदन पर तेल मल दिया था। भौंरी को मूठा भर घास खिलाई थी। (अग्निगर्भ : पृष्ठ 83-84)

 “…भौंरी ने स्त्री-स्वभाव वश अपना सिर बसाई की ओर बढ़ा दिया। बसाई ने उसका गला खुजला दिया। मौन दोस्ती थी।…

ये अद्भुत पंक्तियाँ महाश्वेता देवी जैसी स्त्री कथाकार ही लिख सकती थीं, कोई और नहीं। इसलिए कि वे ही आदिवासी  विश्व-दृष्टि, उसके दर्शन को समझ सकीं जो समस्त जीव जगत और वनस्पति जगत को अपना समझता है, समभाव से देखता है। समस्त जीव और वनस्पतियाँ मानो उसके आत्म का विस्तार हैं। इसलिए महाश्वेता लिखती हैं कि आदिवासी मात्र प्रकृति में सन्नहित नहीं है बल्कि प्रकृति उनके आत्म का हिस्सा है।

दूसरी बात यह भी कि एक स्त्री होने के नाते ही महाश्वेता ‘भौंरी’ के मन को पढ़ सकीं, एक स्वानुभूति का भाव… तभी तो लिख सकीं… “स्त्री स्वभाववश उसने अपना सिर बसाई की ओर बढ़ा दिया…।” अद्भुत…। …आगे का वाक्य है ‘मौन दोस्ती थी।’ एक तो जीव अबोला है इसलिए ‘मौन’, दूसरी बात कि रागात्मक सम्बन्ध तो मौन-भाव में ही फलते-फूलते हैं… यह हकीकत तो निगाहों से ही बयां होती रही है।

आगे की कंडिका में आदिवासी मानुष और भौंरी जैसी जीव की एकात्मता और स्पष्ट होती है। भौंरी को पार उतरने के क्रम में पुलिस की गोली बसाई को लगती है, किन्तु वह भौंरी को बचाने के लिए व्यग्र है, कई गोलियाँ खाकर भी  बचाने का प्रयास नहीं छोड़ता। एक पशु की ‘मौन दोस्ती’ के लिए आदिवासी मानुष का बलिदान पाठक के हृदय पर अमिट छाप छोड़ता है।

दूसरी बात जो मुझे इस रचना में अत्यंत प्रभावित करती है वह है महाश्वेता देवी का पर्यवेक्षण, उनकी गहरी दृष्टि। वे बहुत गहराई से आदिवासी अनुष्ठानों को समझती हैं और समुचित स्थान पर उसको प्रस्तुत करती हैं। जमींदार रामेश्वर भुईयाँ के खिलाफ़ 1972 में ऑपरेशन जागुला के क्रम में शहीद बसाई टुड्डू की पहचान के लिए प्रशासन केवल काली सांतरा पर निर्भर नहीं रहना चाहता बल्कि विभिन्न गांव से संतालों को लाकर पहचान-परेड कराई जाती है। पहचान- कर्ता संतालों का दल, स्त्री-पुरुष सभी पंक्तिबद्ध होकर एक ख़ास दूरी से बसाई टुड्डू की लाश को पहचाने का उपक्रम कर रहे हैं। स्वीकृति में केवल सिर हिलाना है। इस पहचान परेड के क्रम में कोई भी नजदीक जाता हुआ नहीं दिखता  किन्तु जब अंतिम संस्कार के लिए मिट्टी उठाने की बारी आती है तो बसाई टुड्डू के पैरों के पास एक मुट्ठी धान दिखाई पड़ता है। अब अंतिम संस्कार में धान की महत्ता यह बहुत ही सूक्ष्म पर्यवेक्षण की बात है। यह संताल, मुण्डा, हो आदि आदिवासी समुदायों में एक अपरिहार्य अनुष्ठानिक ज़रूरत है। दरअसल, आदिवासी समुदाय ने पुनर्जन्म की अभिकल्पना किसी दैववाणी या आकाशीय धर्म-ग्रंथ से प्राप्त नहीं की थी बल्कि धान के बीज से पौधे और धान की फसल को देख-परख कर ही पुनर्जन्म की अभिकल्पना उनकी विश्व-दृष्टि या दर्शन में उपस्थित होती है। धान कई-कई अनुष्ठानों में एक अपरिहार्य वस्तु के रूप में इस समाज में महत्व पाता है। लेकिन यह तथ्य महाश्वेता देवी की लेखनी के माध्यम से हमारे सामने आ रहा है। जिनकी आलोचना वीर भारत तलवार ट्रिप लगाकर लिखने वाली लेखिका के रूप में बहुत कठोर शब्दों में करते हैं। अब लगता है कि वीरभारत ने थोड़ा अतिरेक से काम लिया है।

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चोट्टि मुण्डा और उसका तीर : आख्यान को इतिहास में बदलने की कीमियागिरी

‘चोट्टि मुण्डा और उसका तीर’ को एक पंक्ति में वर्णित करना हो तो यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह  महाश्वेता देवी की लेखनी से निकला एक क्लासिक-एक कालजयी उपन्यास है। इस रचना में उपन्यास विधा के सारे गुण हमें मिलते हैं। एक तो इस उपन्यास में काल-अवधि के विस्तार को ही देखें। यह उपन्यास धरती आबा बिरसा मुण्डा की क्रांति की अवधि से 1894-1901 से प्रारम्भ होता है। धरती आबा के एक साहिया धानी मुण्डा के माध्यम से उलगुलान की महाध्वनि इस रचना के प्रारम्भिक अध्यायों में प्रकंपित होती हुई दिखाई देती है। वहाँ से शुरू होकर आजाद भारत में इंदिरा गांधी के कार्यकाल, आपातकाल के उत्पीड़न, गुंडो की हत्या की राजनीति, आपातकाल के बाद वाम दल की सरकार का गठन, गुंडो का दल बदल कर सरकारी पार्टी में शामिल होने और जमीन पर कुछ न बदलने की अत्यंत की दारुण सच्चाई का विवरण प्रस्तुत करती यह रचना लगभग 70-80 साल का विस्तार लेकर उपस्थित होती है। इस विस्तार के साथ-साथ नायक चोट्टि मुण्डा की उम्र, उसकी दूरदर्शिता-परिपक्वता भी बढ़ती जाती।

इस उपन्यास की दूसरी सबसे बड़ी विशेषता है—इसके सारे महत्वपूर्ण पात्रों-चरित्रों का बहुआयामी होना। चरित्रों का विकास इकहरा नहीं हुआ है। वे श्वेत-श्याम तस्वीर की तरह हमारे सामने उपस्थित नहीं होते। बल्कि लाला बैद्यनाथ, लाला तीरथनाथ, हरबंस चडढ़ा जैसे जमींदार-महाजन, व्यापारी-उद्योगपति जैसे खल पात्र भी अपने अंतर्द्वंद-दुविधाओं, घृणा और प्रेम के साथ उपस्थित हैं। लगभग सारे चरित्रों की दुविधाओं के विवरण से भी यह रचना एक ऊँचाई को छूती है।

महाश्वेता ने एक अद्भुत चरित्र की रचना चोट्टि मुण्डा के रूप में की है। एक आदिवासी मुण्डा किसान-भूमिहीन मजदूर भी कितना दूरदर्शी, कितना शांत, मीठा बोलने वाला, सामुदायिकता की ताकत को समझने वाला, हिंसा के दुष्परिणामों से सुपरिचित होने के कारण उससे दूर रहने की कोशिश करने वाला किन्तु अपने लोगों के हक-हकूक के लिए किसी भी सीमा तक संघर्ष करने वाला एक अपूर्व नायक जो आपकी स्मृतियों में बस जाता है। यह चरित्र इस रचना की सबसे बड़ी ताकत है। इस कालजयी चरित्र के कारण भी यह रचना कालजयी हो जाती है।

महाश्वेता ने लिखा है कि आदिवासी कहानी के पर्यावरण में निवास करते हैं। वे कथालोक के वासी हैं। उनकी हर चीज कहानी से शुरू होती है और कहानी पर ही खत्म होती है। कहानियों के वाचन-मौखिक शब्दों से जादू फलता-फूलता है। साथ ही वाचिकता को भी अपनी लंबी उम्र के लिए जादू और चमत्कार की जरूरत होती है। इस रचना में महाश्वेता ने अपनी इस अवधारणा का भरपूर उपयोग किया है। धानी मुण्डा और चोट्टि मुण्डा दोनों के जीवन की हर घटना पहले आख्यान बनती है, फिर मिथक में ढल जाती है। समुदाय उन्हें गीत-गान में ढालकर इतिहास बना देता है। पाठक इस आख्यान-मिथक और गीत-गान से गुजरता महाश्वेता की लेखनी के जादू से सम्मोहित-सा हो जाता है। यहाँ उन्होंने कथावाचन-दास्तानगोई की शैली अपनाई है और हम कहानी पढ़ नहीं रहे हैं बल्कि सुन रहे हैं। लगभग हर अध्याय में गीत-गान किस्से को गति प्रदान करते हुए दिखते हैं।

तो चोट्टि मुण्डा, बिसरा का बेटा, ऐतवा का नाती, सोमइया का पोता, बिरसा मुण्डा के संगी धानी मुण्डा का चेला इसी की कहानी महाश्वेता हमें सुना रही हैं। इस बार उन्होंने झारखंड के एक गैर-आदिवासी बाहुल्य, बिहार की सीमा पर के जिले पलामू की पृष्ठभूमि का चयन किया है, जहाँ बंधुआ-मजदूरी के खिलाफ़ लगभग एक दशक तक उन्होंने जमीनी लड़ाई लड़ी थी। पलामू की सामाजिक और कृषि-आर्थिक संरचना की हिंसा में फँसे मुण्डा जैसे आदिवासी किसान, भूमिहीन बटाईदार, खेतिहर मजदूर, बेगार और बंधुआ लोगों की युगों-युगों की त्रासदी इस रचना के हर पन्ने में उभर कर आती है और हमें अवसाद से भर देती है।

जिस प्रकार ‘अग्निगर्भ’ उपन्यास के दुलन माँझी और दोपदी माँझिन पुन: महाश्वेता की ही कहानी ‘द्रौपदी’ में उपस्थित होते हैं और चारित्रिक-विकास की पूर्णता को प्राप्त करते हैं। लगभग यही युक्ति इस उपन्यास में भी महाश्वेता अपनाती हैं। ‘जंगल के दावेदार’ उपन्यास के धरती आबा बिरसा मुण्डा का एक साथी धानी मुण्डा पुन: इस उपन्यास में प्रकट होता है। वही धानी मुण्डा जो शैल रकब पर अंग्रेजी फौज के साथ लड़ाई में शामिल था और जो धरती आबा के साथ गिरफ्तार हुआ। बरसों जेल काटी। सजा पूरी करके छूटने के बावजूद हुकूमत ने जिसे खूँटी और चाईबासा आने से मना किया था और धनुक उठाने से भी। वही पुरखा धानी मुण्डा इस उपन्यास के प्रारम्भिक अध्यायों में छाया हुआ है। वह चोट्टि की दीदी परमी का चाचा ससुर है और जिसकी कहानी गीत-गान बनकर हर मुण्डा की जुबान पर है।

बालक चोट्टि के बार-बार मनुहार करने के बाद धानी मुण्डा ना उसे केवल तीर चलाना सिखाता है बल्कि जंगल की जड़ी-बूटियों, कन्द-मूलों, जंगल के पशु-पंछियों, धरती आबा की विरासत सबसे परिचित करवाता है। अपनी अस्सी की उम्र में मृत्यु की आहट को भाँप लेने के बाद वह अपने धनुक उठाकर चाईबासा की ओर निकल जाता है। धानी जानता है कि उसे गोली मार दी जाएगी। किन्तु वह अपना अंत भी एक प्रतिकार, प्रतीक के तौर पर करना चाहता है। इस प्रकार अपनी शहादत से धानी मुण्डा एक आख्यान, एक मिथ में बदल जाता है।

आगे धानी मुण्डा का शिष्य चोट्टि मुण्डा भी उसके ही नक्शे-कदम पर आगे बढ़ता है। अपनी अचूक निशानेबाजी से ग्रामीण मेलों की हर प्रतियोगिता में विजेता बनकर न केवल लोकप्रियता और अपने तीर के चमत्कार की कहानियों  का कारण बनता है बल्कि अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में भी सफल होता है। उसके घर की बदलती माली हालत के कारण ही चोट्टि गांव के जमींदार और महाजन लाला बैजनाथ से टकराहट की शुरुआत होती है और फिर पूरे उपन्यास में जमींदारों-ठेकेदारों, ईंट-भट्टी के मालिकों, थाने के दरोगा लोगों और युवा लीग के गुंडा-नेताओं के साथ इस उपन्यास के लगभग तीन सौ पन्नों तक लगातार चलती रहती है। यह तनाव और संघर्ष भी पाठक को उपन्यास से बाँधे रखता है।

उम्र के साथ परिपक्व हुए चोट्टि को मालूम है कि ‘हिंसा’ किसी समस्या का समाधान नहीं है। एक जमींदार, एक महाजन मारा जाएगा तो पुलिस-थाना आकर सौ आदिवासियों को मारेंगे, उनके घर जलाएँगे और बच्चे और स्त्रियाँ तबाह हो जाएँगीं। इसलिए चोट्टि मुण्डा बातचीत की रणनीति से अपना काम निकालना जानता है। किन्तु गलत बात, बैठ-बेगारी  और कम मजदूरी का शांतिपूर्ण प्रतिकार करना भी अच्छी तरह से मालूम है। वह जानता है कि गांव के सारे श्रमजीवियों का चाहे वे आदिवासी हों, दलित या किसी अन्य जाति के बिना एका बनाए हुए वह इन जमींदारों-महाजनों, थानों का किसी भी हालत में प्रतिकार नहीं कर पाएगा। इसलिए वह कभी लाला तीरथनाथ और कभी युवा लीग के गुंडो के द्वारा उनके बीच में फूट डालने की हर चाल को नाकाम करना भी जानता है। उसकी दूरदर्शिता के साथ-साथ उसके चमत्कारी तीर के किस्से भी उसके सफल और प्रभावी होने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

बुद्धिमान होने का यह अर्थ नहीं है कि चोट्टि चालाक या धूर्त है। वह हृदय से सच्चा आदिवासी है इसलिए जंगली वराह के आक्रमण से दरोगा की और मालगाड़ी के टकराने वाले गांव भर के दुश्मन लाला तीरथनाथ की भी जान बचाता है।

एक बंजर भूमि को कई बरस अपने खून-पसीने से चोट्टि के बेटे हरमू और कोयल ने उपजाऊ बना दिया तो लाला तीरथनाथ की नियत बदल गई। वह आदिवासी किसान को दिए अपने वचन से मुकर गया। लिखा-पढ़ी नहीं होने की बात ने उसकी बेईमानी को आधार दिया। महाश्वेता की अवधारणा है कि लिखित शब्दों ने आदिवासियों के मौखिक वचन को विस्थापित कर कानून की हिंसा को जन्म दिया। वही हिंसा यहाँ सक्रिय दिखती है। इस विवाद में चोट्टि के बेटे हरमू के हाथों लाला के लोग घायल होते हैं। किन्तु चोट्टि अपने व्यक्तित्व, सदाशयता, चमत्कारी छवि आदि के कारण आदिवासी अफ़सर और दरोगा की मदद से अपने  बेटे की सजा न्यूनतम करवाने में सफल होता है।

एक अंडरग्राउंड फरार नक्सली युवा की जान बचाने की कोशिश तो करता है किन्तु उसे समझाना चाहता है कि इस हिंसा, जमींदार-महाजनों की हत्या से कुछ बदलने वाला नहीं है। तब भी जमीनों पर आदिवासियों और गरीबों का हक़ नहीं मिल पाएगा। इसी  तरह एक अन्य क्रांतिकारी-युवा स्वरूप जो अपने को नक्सली तो नहीं कहता किन्तु किसानों-मजदूरों के संघर्ष में सशस्त्र सहायता के लिए तत्पर है। जो आदिवासियों के लिए अलग राज्य का सपना देखता है।  चोट्टि उसे भी हिंसा के रास्ते की निरर्थकता को समझाने की कोशिश करता है। किन्तु जब युवा लीग के गुंडे उसके गांव में आदिवासी-दलितों के घर जला रहे हैं और स्त्रियों को प्रताड़ित कर रहे हैं तो स्वरूप के गुट के लोगों की सहायता लेने से भी इनकार नहीं करता। पूरे उपन्यास में चोट्टि हिंसा के लिए अपना धनुक नहीं उठाता। किन्तु अपने लोगों को बचाने के लिए जब पहली बार धनुष उठाता भी है तो युवा लीग के गुंडो को जान से मार सकने की क्षमता रखते हुए भी  केवल उनके गोली चलाने वाले हाथों को नाकाम करके छोड़ देता है। यह भी एक तरह की अहिंसा ही है। और उपन्यास के अंत में जब उन्हीं गुंडों से अजीज आकर गांव के युवा उनकी हत्या कर देते हैं तो एसडीओ के सामने चोट्टि धनुष उठाकर हजारों की भीड़ के सामने उनके अपराध को अपने माथे पर ले लेता है। बिना गांधी और गांधीवाद को पढ़े-जाने चोट्टि मुण्डा अहिंसा की राजनीति का एक अलग ही अध्याय रच देता है।

महाश्वेता  इस उपन्यास के दो स्थलों पर ‘आदिवासी अस्मिता’ के सवाल को बहुत ही कुशलता पूर्वक उठाती हैं। इन दोनों अवसरों पर चोट्टि गांव के अनपढ़, गरीबों के दलदल में आकंठ डूबे,  भूमिहीन आदिवासी किसान कभी चोट्टि के पिता बिरसा और कभी खुद चोट्टि के रूप में आदिवासी अस्मिता के प्रश्न पर संघर्ष करते और उसे अपने-अपने ढंग से अंजाम तक पहुँचाते दिखते हैं।

पूरी रचना में महाश्वेता की एक कोशिश रही है कि यह कथा आख्यान और मिथक में ढले। इसलिए चोट्टि मुण्डा के जीवन की हर घटना जो गांव और समाज के लिए हितकारी बनकर आती है उन्हें गांव के लोग गीत-गान में ढालते रहते हैं। इस रचना में महाश्वेता की पूरी कोशिश है कि वे कहानीलोक में बसे आदिवासियों की कथा-कहन परम्परा को वापस ले आएँ ताकि इसे भी परम्परागत वाचन शैली का सौंदर्य मिल सके और एक सच्ची आदिवासी कथा में वह ढल सके।

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और अंत में

महाश्वेता के आदिवासी कथा-साहित्य में अतीत से वर्तमान तक पसरी गरीबी, बदहाली, बंधुआगिरी, अपराधी-सा गरिमाविहीन जीवन और उनकी सत्ता द्वारा निरन्तर उन्मूलन की कोशिश साफ़-साफ़ नज़र आती है। आधुनिकता के लिखित शब्द-कानून आदिवासियों के लिए हिंसा के स्रोत के रूप में बार-बार रेखांकित होते हैं। महाश्वेता की यह अवधारणा सच साबित हुई है कि जेलखाने, पुलिस थाने, बंधुआगिरी और विकास परियोजनाएँ ये सभी आदिवासियों के पूर्ण उन्मूलन में लगी हैं। चोट्टि मुण्डा का बेटा हरमू जब जेल से दो साल की सजा काटकर लौटता है तो उसकी निगाहों से लेखिका जेल में अंडर ट्रायल (विचाराधीन कैदी) के रूप में बंद आदिवासियों की दुर्दशा का वर्णन करती हैं। यह तथ्य आज की तारीख़ में भी उतना ही सच है। झारखंड के जिलों में 66% विचाराधीन कैदी हैं जिनका बहुलांश  आदिवासी, दलित और मुसलमानों का है। फादर स्टेन स्वामी की विचाराधीन कैदी के रूप में ही संस्थागत हत्या के हम सभी साक्षी हैं। विकास परियोजनाएँ या कॉर्पोरेट परियोजनाएँ 1991 के बाद अत्यन्त आक्रामक तरीके से आदिवासी क्षेत्र के संसाधनों के लूट में लगी हैं इस पर तो अब कोई परदेदारी भी नहीं है।

महाश्वेता अपने उपन्यास ‘टेरोडैक्टिल’ के पर्यवेक्षक पत्रकार पूरन की तरह आदिवासियों के इस सम्पूर्ण विनाश को बहुत पहले ही महसूस कर चुकी हैं, यथा—

पत्रकार पूरन प्रेक्षक की भाँति सब कुछ निरख रहा है और अपने और रखिया के बीच की गहरी दूरी को भी महसूस कर रहा है। आदिवासियों ने कैसे उसे आदिम सरीसृप (टेरोडैक्टिल) को अपना पुरखा मानकर काल के अन्तराल पर एक पुल-सा बाँध दिया है। उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा में पूरा पिरथा गांव छूतका/सूतक मना रहा है। खाना-पीना छोड़कर स्वयं भी मृत्यु का वरण करने को आतुर जान पड़ रहा है। यह अद्भुत है और अविश्वसनीय भी।  किन्तु रखिया के साथ आँखों ही आँखों हुई प्रतिज्ञाबद्धता के कारण ना तो उस मर रहे पुरखे के बारे में और ना ही पूरे गांव की मृत्यु-इच्छा के कारण के बारे में अपने मित्र बीडीओ हरिशरण को कुछ बताता है।

गाँव की पहाड़ी के ऊपर की गुफ़ा के अन्दर की रिखिया के संग रात्रिकालीन सानिध्य ने पूरन के अन्तरमन को भी एक प्लूटोनिक अन्तर्दृष्टि मिलती है जिससे वह वनस्पतियों, आदिवासियों और टेरोडैकिटल के बीच की सगोत्रीयता-सगेपन को देख पता है, वही सगापन जो जंगल के आखिरी छोर पर पहुँचते-पहुँचते कहीं खो जाता है।

…आधुनिकता कभी भी टेरोडैकिटल की उदास आँखों का संदेश नहीं पढ़ सकती। यह उदासी रहस्यमयी है। पत्रकार पूरन आश्चर्यचकित है कि आखिर उन आँखों ने रखिया को क्या कहा? क्या उसने कहा उन्हें ज़िंदा रहना चाहिए और मुख्य धारा में समाहित हो जाना चाहिए जो अपने सबसे निचले स्तर पर उन्हें स्थान देगी और उनकी आदिवासियत का पूर्णतया विलोपन हो जाएगा। मगर पिरथा गांव की इस पहाड़ी भूमि को दाँतों से पकड़ कर रखने से भी तो उनकी मुक्ति नहीं है क्योंकि उनकी भूमि और उनकी आत्मा दोनों एक दिन धूल बन जाएँगे और हवा में बह जाएँगे। (इमेजिनरी मैप: पृष्ठ 181)

अपने उपन्यास अग्निगर्भ/बसाई टुड्डू के अंग्रेजी अनुवाद के पूर्वकथन में महाश्वेता देवी अपने आदिवासी कथा-साहित्य के लेखन की अभिप्रेरणा की चर्चा कुछ यूँ करती हैं—

स्वतंत्रता के इक्कतीस बरस में मैंने अन्न, जल, जमीन, कर्ज, बेगार किसी से भी देश के मनुष्य को मुक्ति पाते नहीं देखा। जिस व्यवस्था ने यह मुक्ति नहीं दी उसके विरुद्ध शुभ्र, शुद्ध और सूर्य के समान क्रोध ही मेरे समस्त लेखन की प्रेरणा है।

और अंत में यह कामना है कि महाश्वेता के सूर्य के समान धधकती क्रोध की किरणें हमारे भी हृदय तक पहुँचे। हमारे रक्त को भी उदीप्त करें। वह भी बस रगों में दौड़ना-फिरना छोड़कर हमारी आँखों से टपकना शुरू करें। हम ईमानदार और निश्छल काली सांतरा की तरह केवल प्रेक्षक और पहचानकर्ता बनकर जीवन भर एक अपराध बोध और शर्म से ना घिरे रहें बल्कि बसाई टुडू, चोट्टि मुण्डा और द्रौपदी की तरह इसी जीवन में कुछ कर गुजरे।

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लेखक; निदेशक, डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, राँची
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